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हारे हुए को नया होसला दे सकती है मुंशी प्रेमचंद की ये बातें, आज ही कर लें याद

मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के ऐसे उपन्यासकार हैं, जिनकी रचनाओं में भारत की मिट्टी की सौंधी महक और आम इंसान का दर्द साफ झलकता है। उन्हें 'उपन्यास सम्राट' कहा जाता है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने दशकों पहले थे। यहां पढ़ें उनके प्रेरक, अनमोल विचार।

हारे हुए को नया होसला दे सकती है मुंशी प्रेमचंद की ये बातें- India TV Hindi
Image Source : INDIA TV हारे हुए को नया होसला दे सकती है मुंशी प्रेमचंद की ये बातें

मुंशी प्रेमचंद सिर्फ एक महान उपन्यासकार और कहानीकार ही नहीं थे, बल्कि वे इंसानी जज्बातों और संघर्षों के सबसे बड़े पारखी थे। उनकी रचनाओं में आम आदमी की बेबसी भी है और उस बेबसी से लड़ने का हौसला भी। जीवन में जब भी निराशा घेर ले, हार का सामना करना पड़े या रास्ते धुंधले दिखाई देने लगें, तो प्रेमचंद के विचार एक मार्गदर्शक की तरह काम करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि हार जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की नींव है। प्रेमचंद का मानना था कि जीवन एक निरंतर संघर्ष है और इस संघर्ष में वही टिक सकता है जिसके पास धैर्य और आत्मविश्वास हो। यहां उनके कुछ अनमोल विचार दिए गए हैं जो आपके अंदर हौसला भरने का काम करेंगे। 

जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह भूख से बावला मनुष्य ज़रा-ज़रा सी बात पर तिनक जाता है।

वह प्रेम जिसका लक्ष्य मिलन है प्रेम नहीं वासना है।

बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दुःखों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता।

हमें कोई दोनों जून खाने को दे, तो हम आठों पहर भगवान का जाप ही करते रहें।

जीत कर आप अपने धोखेबाजियों की डींग मार सकते हैं, जीत में सब-कुछ माफ है। हार की लज्जा तो पी जाने की ही वस्तु है।

इतना पुराना मित्रता-रूपी वृक्ष सत्य का एक झोंका भी न सह सका। सचमुच वह बालू की ही ज़मीन पर खड़ा था।

जिन वृक्षों की जड़ें गहरी होती हैं, उन्हें बार-बार सींचने की जरूरत नहीं होती।

मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।

उदासों के लिए स्वर्ग भी उदास है।

स्त्री गालियां सह लेती है, मार भी सह लेती है, पर मैके की निंदा उससे नहीं सही जाती। 

जीवन एक दीर्घ पश्चाताप के सिवा और क्या है।

लज्जा ने सदैव वीरों को परास्त किया है।

जो कुछ अपने से नहीं बन पड़ा, उसी के दुःख का नाम तो मोह है।

न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं। इन्हें वह जैसे चाहती हैं, नचाती हैं।

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