जन्माष्टमी के उत्सव पूरी बृजभूमि पर धूमधाम से मनाया जाता है। बृज में अलग-अलग जगहों पर कान्हा ने अलग लीलाएं रचाईं। कही मिट्टी में लोट लगाकर धरती को धन्य बनाया तो कहीं यमुना तट पर बाल लीलाएं दिखाई। बृज क्षेत्र में ऐसी कई जगह हैं जहां भगवान कृष्ण का बचपन बीता है। लेकिन ज्यादातर लोगों को जन्मभूमि और वृंदावन के बारे में ही पता है। जन्माष्टमी पर जन्मभूमि मथुरा मंदिर में और बांके बिहारी मंदिर वृंदावन में पैर रखने की भी जगह नहीं होती। देश और विदेश से बड़ी संख्या में कान्हा के भक्त यहां पहुंचते हैं। ऐसे में आप भी कृष्ण जन्माष्टमी पर घूमने का प्लान बना रहे हैं तो मथुरा वृंदावन जाने की बजाय इन कुंज गलियों में घूमने का प्लान कर लें। यहां पहुंचकर आप नटखट कान्हा की लीलाओं को देख और महसूस कर पाएंगे।
जन्माष्टमी कहां मनाएं?
द्वारकाधीश मंदिर- अगर आप मथुरा ही जाना चाहते हैं तो दिन के वक्त में जन्मभूमि के दर्शन कर आएं। इस वक्त भीड़ थोड़ी कम होती है। इसके बाद मथुरा के द्वारकाधीश मंदिर चले जाएं। यमुना किनारे बसा ये प्राचीन मंदिर बेहद खास है। द्वारकाधीश मंदिर में भी जन्माष्टमी की भव्य तैयारियां की जाती हैं। सामने बहती यमुना में आप नौकाविहार का भी आनंद ले सकते हैं।
गोकुल गांव और ब्रह्मांड घाट- जन्माष्टमी पर आप गोकुल गांव जा सकते जहां कृष्ण भगवान का बचपन बीता था। गोकुल की गलियों में कान्हा के बचपन की लीलाएं आज भी देखी जा सकती हैं। यहां यमुना नदी के किनारे ब्रह्मांड घाट है। ये वही जगह है जहां भगवान कृष्ण ने मिट्टी खाई थी और जब मां यशोदा ने मुंह खोलने के लिए कहा तो उन्हें कृष्ण के मुंह में पूरा ब्रह्मांड नजर आया था। ये जगह आज भी कृष्ण के बचपन की याद दिलाती है।
रमणरेती- मथुरा से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है रमणरेती, जहां भगवान कृष्ण ने रेत में लोट लगाई थी। यहां एक खूबसूरत कृष्ण मंदिर है और ये इलाका बहुत शांत है। यमुना के रेत में कृष्ण भक्त भी लोट लगाते हैं और बृज की रज में खुद को समर्पित कर देते हैं। जन्माष्टमी पर आप रमणरेती घूमने जा सकते हैं।
महावन चौरासी खंभा- इस जगह को नंद भवन भी कहते हैं। यहां 84 खंभों पर टिका एक प्राचीन मंदिर है, जिसे भगवान कृष्ण के बचपन से जुड़ा माना जाता है। ढ़ाई साल की उम्र तक कृष्ण भगवान इसी घर में रहे थे। मंदिर में यशोदा, नंदबाबा, बलराम और बीच में बाल स्वरूप कृष्ण की मूर्ति है। यहीं कृष्ण ने पूतना का वध किया था और उसकी भी एक प्रतिमा थोड़ी दूर पर है।
नंदगांव- कंस के आतंक की वजह से नंदबाबा और यशोदा ने गोलुक की गलियां छोड़ नंदगांव में अपना घर बना लिया था। यहां नंदभवन में जन्मोत्सव की भव्य तैयारियां की जाती है। नंदगांव के हर घर और गली से कृष्ण की कोई न कोई लीला जुड़ी है। आप जन्माष्टमी के दिन नंद गांव घूमने जाने का प्लान बना सकते हैं। यहां आप बृजभूमि में होने का अहसास कर सकते हैं।
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