नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने कहा है कि वो चालू वित्त वर्ष में 2,442 किलोमीटर लंबे 54 हाईवे और एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट्स के लिए बोली आमंत्रित करने का प्लान बना रहा है। इन 54 हाईवे प्रोजेक्ट्स की कुल लागत 1.80 लाख करोड़ रुपये होगी। निश्चित रूप से ये 54 नए प्रोजेक्ट्स देश की तस्वीर बदलने में बड़ी और अहम भूमिका निभाएंगे। हालांकि, ये आंकड़े NHAI द्वारा 2025-26 में शुरू किए जाने के लिए पहचाने गए 124 प्रोजेक्ट्स (कुल लंबाई 6,376 किलोमीटर और अनुमानित लागत 3,45,466 करोड़ रुपये) की तुलना में काफी कम है।
किन-किन राज्यों में बनाए जाएंगे ये 54 हाईवे
NHAI के एक दस्तावेज के अनुसार, पहचाने गए 54 हाईवे प्रोजेक्ट्स आंध्र प्रदेश, बिहार, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, तमिलनाडु और तेलंगाना में फैले हुए हैं। ये प्रोजेक्ट्स न सिर्फ इन राज्यों की तस्वीर बदलेंगे, बल्कि देश की ट्रांसपोर्ट इंफ्रा और अर्थव्यवस्था को भी नई उड़ान देंगे। एक अस्थायी लिस्ट के अनुसार, 26 प्रोजेक्ट्स इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) मोड पर, 21 प्रोजेक्ट्स हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) के तहत और 7 प्रोजेक्ट्स बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) मॉडल के तहत दिए जाएंगे।
देश के कुल नेशनल हाईवे कंस्ट्रक्शन में 50 प्रतिशत तक है NHAI की हिस्सेदारी
बताते चलें कि भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के तहत देश में कुल नेशनल हाईवे कंस्ट्रक्शन में NHAI की हिस्सेदारी 45% से 50% के बीच है। इसके अलावा, अन्य संस्थाओं में नेशनल हाईवेज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NHIDCL), बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन और राज्य लोक निर्माण विभाग (PWD) शामिल हैं, जो मिलकर बाकी की 50% हिस्सेदारी संभालते हैं।
भारत में 3 प्रमुख तरीकों से पूरे किए जाते हैं नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स
देश में नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स मुख्य रूप से तीन तरीकों से पूरे किए जाते हैं- बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT), हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) और इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC)। बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) के तहत रखरखाव (मेंटेनेंस) वाले प्रोजेक्ट्स के लिए रियायती अवधि (concession period) 15 से 20 साल होती है और हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) के लिए यह आमतौर पर 15 साल होती है। प्रोजेक्ट की रियायती अवधि के दौरान संबंधित हाईवे के हिस्सों के रखरखाव की जिम्मेदारी रियायत पाने वाली कंपनी की होती है।
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