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अल नीनो का कहर! जुलाई-अगस्त में बढ़ सकते हैं दूध के दाम, कमजोर मानसून से बढ़ा संकट

देशभर के करोड़ों उपभोक्ताओं के लिए आने वाले महीनों में दूध महंगा हो सकता है। डेयरी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो और कमजोर मानसून की आशंका के चलते पशुओं के चारे और पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

जुलाई-अगस्त में दूध के...- India TV Hindi
Image Source : CANVA जुलाई-अगस्त में दूध के दाम बढ़ सकते हैं

देश में महंगाई से जूझ रहे आम लोगों को आने वाले दिनों में एक और झटका लग सकता है। दूध की कीमतों में जुलाई और अगस्त के दौरान 3 से 4 फीसदी तक बढ़ोतरी होने की आशंका जताई जा रही है। डेयरी उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो और कमजोर मानसून की वजह से पशुओं के चारे और पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिसका सीधा असर दूध उत्पादन पर पड़ेगा।

क्या है अल नीनो और कैसे पड़ता है असर?

अल नीनो एक मौसम संबंधी घटना है, जिसके कारण कई क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश होती है। जब मानसून कमजोर रहता है तो हरे चारे का उत्पादन घट जाता है और पशुओं के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पाता। इससे दूध देने वाले पशुओं की सेहत और उत्पादकता प्रभावित होती है। ऐसे में चारे की कमी होने पर पशुपालकों की लागत बढ़ जाती है। कई छोटे किसान पशुओं की संख्या भी कम कर देते हैं, जिससे बाजार में दूध की आपूर्ति घटने लगती है।

जुलाई-अगस्त में बढ़ सकते हैं दाम

डेयरी सेक्टर से जुड़े जानकारों के अनुसार यदि प्रमुख दूध उत्पादक राज्यों में बारिश सामान्य से कम रहती है, तो अगले कुछ महीनों में दूध की कीमतों में 3-4 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे दूध के साथ-साथ दही, पनीर, घी और अन्य डेयरी उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं। हालांकि, फिलहाल बाजार में दूध की उपलब्धता सामान्य बनी हुई है, लेकिन उद्योग जगत लगातार मौसम की स्थिति पर नजर रखे हुए है।

डेयरी कंपनियां कर रही हैं तैयारी

देश की बड़ी डेयरी कंपनियां संभावित संकट से निपटने के लिए पशुपालकों के साथ मिलकर चारा प्रबंधन और वैकल्पिक व्यवस्था पर काम कर रही हैं। कंपनियों का कहना है कि अभी तक अल नीनो का सीधा असर सप्लाई पर नहीं दिखा है, लेकिन भविष्य की स्थिति को देखते हुए तैयारी शुरू कर दी गई है।

पहले भी बढ़ चुके हैं दूध के दाम

गौरतलब है कि मई महीने में कई प्रमुख डेयरी कंपनियों ने दूध की कीमतों में बढ़ोतरी की थी। उस समय पशु आहार, ईंधन, पैकेजिंग और खरीद लागत में वृद्धि को इसकी मुख्य वजह बताया गया था।

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