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रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने से कच्चे तेल की सप्लाई पर जोखिम बढ़ा, भारत के लिए भी खड़ी हो सकती हैं समस्याएं

लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एक्ट ऑफ 2026 रूसी ऊर्जा के 5 सबसे बड़े खरीदारों को लक्षित करता है और इसका उद्देश्य तेल और गैस की बिक्री से रूस को होने वाली कमाई में कटौती करना है।

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Image Source : AFP कच्चे तेल की सप्लाई पर मंडराने लगे संकट के बादल

रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने के लिए अमेरिकी सीनेट में हुए मतदान से रूसी कच्चे तेल की सप्लाई में दिक्कतों का जोखिम बढ़ गया है। हालांकि, इससे भारत और चीन को होने वाले कच्चे तेल की सप्लाई में तुरंत बदलाव की संभावना कम है। Kpler के एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने ये बात कही। बताते चलें कि अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को एक रूस प्रतिबंध विधेयक पारित किया, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों के आयात पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देगा, जो रूसी तेल और गैस के सबसे बड़े 5 खरीदारों में शामिल हैं। 

रूस को तेल और गैस की बिक्री से होने वाली कमाई में कटौती करना बिल का मुख्य उद्देश्य 

लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एक्ट ऑफ 2026 रूसी ऊर्जा के 5 सबसे बड़े खरीदारों को लक्षित करता है और इसका उद्देश्य तेल और गैस की बिक्री से रूस को होने वाली कमाई में कटौती करना है। इस कदम को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलनी बाकी है और इसके प्रभावी होने से पहले आगे के विधायी व प्रशासनिक चरणों से गुजरना होगा। 

सीनेट में पास हुए बिल के सामने अभी भी अभी भी विधायी और प्रशासनिक बाधाएं

सुमित रितोलिया के अनुसार, इन उपायों के सामने अभी भी विधायी और प्रशासनिक बाधाएं हैं, जबकि इनका प्रभाव काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन इन्हें कितनी आक्रामक तरीके से लागू करता है। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रतिबंध का समय बहुत महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में अपेक्षाकृत कमी बनी हुई है और पश्चिम एशिया की सप्लाई पर अनिश्चितता ने वैकल्पिक स्रोतों के महत्व को बढ़ा दिया है। इसलिए रूसी तेल पर एक महत्वपूर्ण प्रतिबंध सिर्फ मौजूदा व्यापार प्रवाह को मोड़ने के बजाय वैश्विक संतुलन को सख्त कर सकता है। 

यूक्रेन पर हमले के बाद भारत ने रूस से बढ़ाया तेल का आयात

फरवरी 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद से भारत की रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता काफी बढ़ गई है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और यूरोपीय खरीदारों के हटने के कारण मॉस्को को एशियाई रिफाइनरियों को भारी छूट देनी पड़ी। US एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, 2021 में रूस ने भारत को हर दिन 1,00,000 बैरल से भी कम कच्चा तेल सप्लाई किया था, जो भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 2.5 प्रतिशत था। ये मात्रा 2022 में बढ़कर लगभग 7,40,000 बैरल प्रति दिन (bpd) और 2023 में लगभग 1.8 मिलियन bpd हो गई, जिससे रूस उस साल भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बन गया और भारत के कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 39 प्रतिशत रही।

भारतीय रिफाइनरियों ने जुलाई 2026 में आयात किया रिकॉर्ड 2.8 मिलियन bpd कच्चा तेल

Kpler के डेटा से पता चलता है कि भारतीय रिफाइनरियों ने जुलाई 2026 में रिकॉर्ड 2.8 मिलियन bpd रूसी कच्चे तेल का आयात किया, जो 5 मिलियन bpd से थोड़ा ज्यादा के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 55.5 प्रतिशत था। Kpler के डेटा के अनुसार, इसकी तुलना 2024 में औसतन लगभग 1.8 मिलियन bpd से की जा सकती है। रितोलिया ने कहा कि रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए सप्लाई का एक महत्वपूर्ण विकल्प बन गया है, जिससे मध्य पूर्व के पारंपरिक सप्लाई रूटों में रुकावटों का उन पर असर कम हुआ है।

कच्चे तेल की कीमतों में आ सकती है तेजी

रितोलिया ने कहा कि मौजूदा मात्रा में रूसी कच्चे तेल की जगह दूसरा तेल लाना कम समय में मुश्किल, या शायद नामुमकिन होगा। इसलिए, अगर भारत या दूसरे एशियाई खरीदारों को रूसी सप्लाई में अचानक कटौती होती है, तो ग्लोबल ऑयल बैलेंस पर दबाव बढ़ सकता है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं

ऊर्जा सुरक्षा को लेकर पैदा हो सकती हैं चिंताएं

भारत के लिए, इसका असर सिर्फ रिफाइनरी की खरीद लागत तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे देश का कुल कच्चा तेल आयात बिल बढ़ सकता है, चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं पैदा हो सकती हैं। रितोलिया ने कहा कि बड़ा सवाल ये नहीं है कि क्या रूसी तेल को दूसरे खरीदारों को भेजा जा सकता है, बल्कि ये है कि क्या ग्लोबल मार्केट में और सख्ती लाए बिना उनकी जगह लेने के लिए पर्याप्त वैकल्पिक सप्लाई उपलब्ध है।

PTI Inputs

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