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Azhar Iqbal Shayari: एक मुद्दत से हैं सफ़र में हम...यहां पढ़ें अज़हर इक़बाल के मशहूर शेर

Azhar Iqbal Shayari: घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए, मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए... यहां हम अज़हर इक़बाल की मशहूर शायरी लेकर आए हैं। यहां पढ़ें उनके मशहूर शेर।

Azhar Iqbal Shayari- India TV Hindi
Image Source : AZHAR IQBAL INSTAGRAM Azhar Iqbal Shayari

अज़हर इक़बाल भारत के एक बेहद लोकप्रिय उर्दू शायर, कवि और साहित्यकार हैं। वे आज के दौर के मुशायरों और काव्य सम्मेलनों जैसे जश्न-ए-रेख़्ता का एक बहुत ही जाना-माना नाम हैं। अपनी गहरी और दिल को छू लेने वाली ग़ज़लों और नज़्मों के लिए वे युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। उनकी शायरी की खासियत उनकी सरल भाषा और गहरा अर्थ है। वे इंसानी रिश्तों, अकेलेपन, इश्क, समाज और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के फलसफे को बहुत ही खूबसूरत तरीके से बयां करते हैं। साल 2015 में अज़हर इक़बाल ने 'हर्फ़कार फाउंडेशन' की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य उर्दू-हिंदी साहित्य, थिएटर और कला को बढ़ावा देना है, जिसके ज़रिए वे नए कलाकारों और कवियों को एक मंच प्रदान करते हैं। उनकी शायरी लोगों के दिलों को छू जाती है। ऐसे में यहां हम अज़हर इक़बाल की मशहूर शायरी लेकर आए हैं। यहां पढ़ें उनके मशहूर शेर। 

1. एक मुद्दत से हैं सफ़र में हम
घर में रह कर भी जैसे बेघर से

2. घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए
मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए

3. तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती
मैं राख होने लगा हूँ दिए जलाते हुए

4. ये पहला इश्क़ है तुम्हारा सोच लो
मिरे लिए ये रास्ता नया नहीं

5. हर एक सम्त यहां वहशतों का मस्कन है
जुनूं के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या

6. नींद आएगी भला कैसे उसे शाम के बा'द
रोटियाँ भी न मयस्सर हों जिसे काम के बा'द

7. ये कैफ़ियत है मेरी जान अब तुझे खो कर
कि हम ने ख़ुद को भी पाया नहीं बहुत दिन से

8. न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी
तअल्लुक़ात की पाबंदियां निभाते हुए

9. फिर इस के बाद मनाया न जश्न ख़ुश्बू का
लहू में डूबी थी फ़स्ल-ए-बहार क्या करते

10. हर एक शख़्स यहां महव-ए-ख़्वाब लगता है
किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से

11. है अब भी बिस्तर-ए-जां पर तिरे बदन की शिकन
मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूं उसे मिटाते हुए

12. सताया आज मुनासिब जगह पे बारिश ने
इसी बहाने ठहर जाएं उस का घर है यहां

13. दरख़्त हाथ हिलाते थे रहनुमाई को
मुसाफिरों ने तो कुछ भी नहीं कहा मुझ से

14. मुद्दतों ब'अद मयस्सर हुआ मां का आंचल
मुद्दतों ब'अद हमें नींद सुहानी आई

15. मुद्दतों ब'अद पशेमां हुआ दरिया हम से
मुद्दतों ब'अद हमें प्यास छुपानी आई

16. आज फिर नींद को आँखों से बिछड़ते देखा
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई

17. ले गईं दूर बहुत दूर हवाएं जिस को
वही बादल था मिरी प्यास बुझाने वाला

18. ठहरी ठहरी सी तबीअत में रवानी आई
आज फिर याद मोहब्बत की कहानी आई

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