अमेरिका में पहली बार मौत की सजा का लाइव प्रसारण! निदाल मलिक हसन पर दागी जाएंगी गोलियां
अमेरिका में 2009 के फोर्ट हूड गोलीबारी मामले में दोषी निदाल मलिक हसन को 3 दिसंबर को फायरिंग स्क्वॉड से मौत की सजा देने की योजना है। इसके लाइव प्रसारण की खबर ने पारदर्शिता, नैतिकता और कानूनी प्रक्रिया पर बहस छेड़ दी है।

Highlights
- फोर्ट हूड गोलीबारी के दोषी निदाल मलिक हसन को 3 दिसंबर को दी जाएगी मौत की सजा।
- पेंटागन के मुताबिक, 65 साल से अधिक समय बाद सैन्य फांसी का लाइव प्रसारण होगा।
- विशेषज्ञों ने फैसले पर उठाए सवाल, कहा- 'इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, लेकिन कानूनी चिंताएं भी हैं।'
वॉशिंगटन: अमेरिका में फोर्ट हूड सैन्य अड्डे पर 2009 में गोलीबारी करने वाले निदाल मलिक हसन को अब फायरिंग स्क्वॉड यानी गोली मारकर मौत की सजा दी जाएगी। पेंटागन ने गुरुवार को बताया कि इस पूरी प्रक्रिया का लाइव प्रसारण किया जाएगा। अमेरिकी सेना के मुताबिक, हसन को 3 दिसंबर को टेक्सास के फोर्ट हूड में सजा दी जाएगी। इस मामले ने अमेरिका में मौत की सजा देने के तरीकों, सरकारी पारदर्शिता और सार्वजनिक रूप से फांसी दिखाने की नैतिकता पर नई बहस छेड़ दी है।
2009 की गोलीबारी में 13 लोगों की हुई थी मौत
निदाल मलिक हसन अमेरिकी सेना में मेजर और मनोचिकित्सक था। 5 नवंबर 2009 को वह टेक्सास के फोर्ट हूड सैन्य अड्डे पर एक मेडिकल बिल्डिंग में घुसा, जहां सैनिक वैक्सीनेशन और तैनाती से पहले जरूरी मेडिकल जांच के लिए कतार में खड़े थे। हसन ने वहां गोलीबारी शुरू कर दी। इस हमले में 13 लोगों की मौत हुई और 32 अन्य घायल हो गए। उसने भाग रहे सैनिकों पर भी पीछे से गोलियां चलाई थीं। इस मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद अब उसे सैन्य अदालत के फैसले के तहत मौत की सजा दी जानी है।
पीट हेगसेथ ने कहा था, 'सजा सार्वजनिक होगी'
अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने बुधवार को टीवी चैनल रियल अमेरिका वॉइस से बातचीत में कहा था कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लोग सजा को देख सकें और यह प्रक्रिया सार्वजनिक होगी। हालांकि, उस समय उन्होंने स्पष्ट रूप से लाइव प्रसारण का जिक्र नहीं किया था। गुरुवार को पेंटागन के अधिकारियों ने बताया कि फायरिंग स्क्वॉड से दी जाने वाली मौत की सजा का लाइव प्रसारण किया जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि इस योजना के बारे में और जानकारी बाद में दी जाएगी। इस घोषणा ने सैन्य न्याय व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या निदाल मलिक हसन की सजा टल सकती है?
विशेषज्ञों के मुताबिक, निदाल मलिक हसन अपनी सजा के खिलाफ नागरिक अदालत में याचिका दाखिल कर सकता है। ऐसी याचिका को हेबियस कॉर्पस याचिका कहा जाता है, जिसके जरिए किसी व्यक्ति की हिरासत या उससे जुड़ी कानूनी प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी जाती है। इससे सजा में काफी देरी हो सकती है। येल लॉ स्कूल में सैन्य कानून के विशेषज्ञ और विजिटिंग लेक्चरर यूजीन आर. फिडेल ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया मौजूदा अमेरिकी प्रशासन के कार्यकाल से भी आगे बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि यह भी तय नहीं है कि अगला प्रशासन मौत की सजा को लेकर यही रुख अपनाएगा।
लाइव प्रसारण के पक्ष में भी हैं कुछ एक्सपर्ट
फोर्डहम यूनिवर्सिटी की कानून की प्रोफेसर और मौत की सजा की एक्सपर्ट डेबोरा डेनो ने कहा कि सजा का लाइव प्रसारण पूरी प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बना सकता है। इससे जनता को पता चलेगा कि मौत की सजा देने की प्रक्रिया वास्तव में कैसी होती है। उन्होंने कहा कि टेनेसी में क्रिस्टा पाइक को घातक इंजेक्शन देने की प्रक्रिया में हुई गड़बड़ी के बाद इस मुद्दे पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे समय में लाइव प्रसारण से लोगों को सजा देने के तरीकों और उनसे जुड़ी समस्याओं को समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इससे जुड़े नैतिक और कानूनी सवाल भी महत्वपूर्ण हैं।
फायरिंग स्क्वॉड को क्यों माना जा रहा है विकल्प?
विलानोवा यूनिवर्सिटी के कानून के प्रोफेसर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मिलिट्री जस्टिस के उपाध्यक्ष ब्रेनर फिसेल ने कहा कि कई अमेरिकी राज्यों को घातक इंजेक्शन देने के लिए जरूरी दवाएं हासिल करने और इसमें शामिल होने वाले चिकित्सा पेशेवरों को तैयार करने में परेशानी होती है। ऐसे में फायरिंग स्क्वॉड को कुछ लोग कम अमानवीय विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। फिसेल के मुताबिक, गोली मारकर मौत की सजा देने का तरीका ज्यादा सटीक हो सकता है। उनके मुताबिक, हेगसेथ इस फैसले के जरिए सेना की घातक ताकत और सख्त रवैये को दिखाना चाहते हैं।
ईरान में सार्वजनिक फांसी का विरोध कर चुके हैं ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हसन की मौत की सजा को मंजूरी दी है। हालांकि, वह पहले ईरान में सार्वजनिक रूप से दी जाने वाली मौत की सजाओं की आलोचना कर चुके हैं। ईरान में प्रदर्शनकारियों को फांसी दिए जाने की आशंका का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कई बार वहां की सरकार पर दबाव बनाने की बात कही थी। यह मुद्दा 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी सैन्य हमले से पहले भी चर्चा में रहा था। 14 जनवरी को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा था कि उन्हें बताया गया है कि ईरान में लोगों की हत्याएं रुक रही हैं और फांसी देने की कोई योजना नहीं है।
अदालत में हसन ने खुद को बताया था हमलावर
हसन ने अपने मुकदमे के दौरान वकीलों को हटा दिया था और खुद अपना पक्ष रखा था। सुनवाई शुरू होते ही उसने जूरी के सामने स्वीकार किया था कि गोलीबारी उसी ने की थी। अगले 3 हफ्तों तक उसने बहुत कम बातें कहीं। उसके सरकारी तौर पर नियुक्त सहायक वकीलों को लगा कि उसका मकसद किसी भी तरह मौत की सजा हासिल करना था। सैन्य अभियोजन पक्ष ने करीब 90 गवाह पेश किए, लेकिन हसन ने अपने बचाव में किसी गवाह को नहीं बुलाया और न ही अंतिम दलील दी।
'मुसलमानों को बचाने के लिए किया था हमला'
हसन ने मुकदमे के दौरान पत्रकारों को कुछ दस्तावेज भी दिए थे। इन दस्तावेजों से पता चला कि उसने सैन्य मानसिक स्वास्थ्य कर्मचारियों से कहा था कि मौत की सजा दिए जाने पर भी वह शहीद कहला सकता है। हसन का कहना था कि उसने सैनिकों को अफगानिस्तान जाने और वहां अपने साथी मुसलमानों को मारने से रोकने के लिए हमला किया था। हालांकि, 2013 में सैन्य न्यायाधीश ने उसे इस दलील को बचाव के रूप में पेश करने की इजाजत नहीं दी। कानून प्रवर्तन अधिकारियों की गोली पीठ में लगने के बाद हसन कमर से नीचे लकवाग्रस्त हो गया था। अब वह व्हीलचेयर का इस्तेमाल करता है।
हसन के वकील ने स्वास्थ्य को लेकर जताई चिंता
हसन के आपराधिक मुकदमे के बाद कई नागरिक मामलों में उसका प्रतिनिधित्व कर चुके पूर्व सैन्य न्यायाधीश और वकील जॉन गैलिगन ने बुधवार को उससे बातचीत की। हालांकि, कानूनी सीमाओं के कारण उन्होंने बातचीत की ज्यादा जानकारी देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें अधिकारियों की बताई योजना के तहत हसन के शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता है। गैलिगन ने यह भी कहा कि हसन को अभी तक कानूनी सलाहकार तक पहुंच नहीं मिली है।
65 साल बाद किसी सैनिक को मौत की सजा
हेगसेथ ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिकी सेना ने फायरिंग स्क्वॉड के जरिए किसी सैनिक को मौत की सजा नहीं दी है। हालांकि, अमेरिकी सेना में अंतिम फांसी 13 अप्रैल 1961 को हुई थी, जब सेना के प्राइवेट जॉन बेनेट को फंदे पर लटकाया गया था। यानी सैन्य फांसी के इतिहास में लंबे अंतराल के बाद हसन का मामला सामने आया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, संगठन को दुनिया में कम से कम 17 सार्वजनिक फांसी की जानकारी मिली थी। इनमें 11 ईरान में और 6 अफगानिस्तान में हुई थीं। (AP से इनपुट्स के साथ)
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