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RBI Policy: रिजर्व बैंक ने कर्ज लेने वालों को दी राहत, MPC बैठक में रेपो रेट को लेकर किया बड़ा फैसला

महंगाई को कंट्रोल करने के लिए आरबीआई ने मई 2022 से फरवरी 2023 के बीच रेपो रेट को 2.5 फीसदी बढ़ा दिया था। जिसका असर घर और कार के कर्ज पर हुआ है। कर्ज महंगा होने से EMI का बोझ भी बढ़ता जा रहा है।

shatkti Kant Das- India TV Paisa Image Source : FILE ShaktiKant Das

रिजर्व बैंक ने तीन दिन चली मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee) की बैठक के नतीजों की घोषणा कर दी है। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास (Shaktikanta Das) दास ने घोषणा करते हुए कहा कि लगातार दूसरी बैठक में ब्याज दरों को स्थिर रखा है। रेपो रेट इस बार भी 6.5 प्रतिशत पर स्थिर है। इस प्रकार यदि आपने होम लोन लिया है या फिर जल्द ही कार लोन लेने वाले हैं तो आपके लिए राहत की बात है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की छह सदस्यों वाली मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee) की 43वीं बैठक 6 जून 2023 को शुरू हुई थी। 

बता दें कि रिजर्व बैंक पिछले साल मई से लगातार रेपो रेट (RBI Repo Rate) में बढ़ोत्तरी कर रहा है। सिर्फ अप्रैल में हुई एमपीसी की बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी। रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट महंगा करने से सभी प्रकार के कर्ज महंगे (Expensive Loans) हो गए हैं। इसका सबसे बुरा असर होम लोन लेने वाले ग्राहकों की ईएमआई (EMI) पर पड़ा है। यही कारण है कि कर्ज लेने वाले आरबीआई से राह की उम्मीद लगाएं थे। वहीं शेयर बाजार में पैसा लगाने वाले भी इस घोषणा का इंतजार कर रहे थे। 

बीते एक साल में 2.5% बढ़ी है रेपो रेट

पिछले साल कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच रिजर्व बैंक ने करीब 2 साल के ब्रेक के बाद अचानक रेपो रेट में बदलाव शुरू किया। तब से पिछले एक साल में देश में कर्ज (Loan) लगातार महंगा हो रहा है। बता दें कि महंगाई को कंट्रोल करने के लिए आरबीआई ने मई 2022 से फरवरी 2023 के बीच रेपो रेट को 2.5 फीसदी बढ़ा दिया था। जिसका असर घर और कार के कर्ज पर हुआ है। कर्ज महंगा होने से EMI का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। पिछले साल तक करीब 7 फीसदी के आसपास मिल रहा होम लोन (Home Loan) और कार लोन (Car Loan) दहाई के अंकों में पहुंच गया। वहीं पर्सनल लोन (Personal Loan) सबकी ईएमआई (EMI) लगातार बढ़ रही है। हालांकि आम लोगों को फिक्स डिपॉजिट की बढ़ती दरों के रूप में फायदा भी मिला है। 

रेपो रेट से आम आदमी पर क्या पड़ता है प्रभाव

जब बैंकों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध होगा यानी रेपो रेट कम होगा तो वो भी अपने ग्राहकों को सस्ता कर्ज दे सकते हैं। और यदि रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाएगा तो बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा और वे अपने ग्राहकों के लिए कर्ज महंगा कर देंगे। बता दें कि रेपो रेट में बदलाव करने से आम जनता पर असर कैसे पड़ता है, उसे आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है। बैंक हमें कर्ज देते हैं और उस कर्ज पर हमें ब्याज देना पड़ता है। ठीक वैसे ही बैंकों को भी अपने रोजमर्रा के कामकाज के लिए भारी-भरकम रकम की जरूरत पड़ जाती है और वे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से कर्ज लेते हैं। इस ऋण पर रिजर्व बैंक जिस दर से उनसे ब्याज वसूल करता है, उसे रेपो रेट कहते हैं।

पिछले साल कब-कब बढ़ी ब्याज दर 
  • मई - 0.4 %
  • 8 जून -0.5 %
  • 5 अगस्त - 0.5 %
  • 30 सितंबर - 0.5 %
  • 7 दिसंबर - 0.35 %
  • 8 फरवरी - 0.25%

रेपो रेट (Repo Rate)

रेपो रेट को आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है। बैंक हमें कर्ज देते हैं और उस कर्ज पर हमें ब्याज देना पड़ता है। ठीक वैसे ही बैंकों को भी अपने रोजमर्रा के कामकाज के लिए भारी-भरकम रकम की जरूरत पड़ जाती है और वे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से कर्ज लेते हैं। इस ऋण पर रिजर्व बैंक जिस दर से उनसे ब्याज वसूल करता है, उसे रेपो रेट कहते हैं।

रेपो रेट से आम आदमी पर क्या पड़ता है प्रभाव

जब बैंकों को कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध होगा यानी रेपो रेट कम होगा तो वो भी अपने ग्राहकों को सस्ता कर्ज दे सकते हैं। और यदि रिजर्व बैंक रेपो रेट बढ़ाएगा तो बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा और वे अपने ग्राहकों के लिए कर्ज महंगा कर देंगे।

रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate)

यह रेपो रेट से उलट होता है। बैंकों के पास जब दिन-भर के कामकाज के बाद बड़ी रकम बची रह जाती है, तो उस रकम को रिजर्व बैंक में रख देते हैं। इस रकम पर आरबीआई उन्हें ब्याज देता है। रिजर्व बैंक इस रकम पर जिस दर से ब्याज देता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं।

रिवर्स रेपो रेट का आम आदमी पर ऐसे पड़ता है प्रभाव

जब भी बाजारों में बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दें। इस तरह बैंकों के कब्जे में बाजार में छोड़ने के लिए कम रकम रह जाएगी।

जानिए क्या होता है नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio/CRR)

बैंकिंग नियमों के तहत हर बैंक को अपने कुल कैश रिजर्व का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना ही होता है, जिसे कैश रिजर्व रेश्यो अथवा नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) कहा जाता है। यह नियम इसलिए बनाए गए हैं, ताकि यदि किसी भी वक्त किसी भी बैंक में बहुत बड़ी तादाद में जमाकर्ताओं को रकम निकालने की जरूरत पड़े तो बैंक पैसा चुकाने से मना न कर सके। 

आम आदमी पर CRR का ऐसे पड़ता है प्रभाव

अगर सीआरआर बढ़ता है तो बैंकों को ज्यादा बड़ा हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होगा और उनके पास कर्ज के रूप में देने के लिए कम रकम रह जाएगी। यानी आम आदमी को कर्ज देने के लिए बैंकों के पास पैसा कम होगा।  अगर रिजर्व बैंक सीआरआर को घटाता है तो बाजार नकदी का प्रवाह बढ़ जाता है।

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