नई दिल्ली। एक ओर जहां सरकार कैशलेस इकोनॉमी के लिए देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रही है, वहीं भारत जैसे देश में ई-वॉलेट अभी भी पूरी तरह से सुरक्षित नहीं बन पाया है। सुरक्षा में लूपहोल की वजह से हैकर्स इसका फायदा उठा रहे हैं। ई-वॉलेट से पैसा बिना किसी निगरानी के निकल रहा है, जिसे ट्रैस भी नहीं किया जा सकता। हाल ही में कोलकाला में एक बड़ी ई-डकैती हुई है, जो सबके लिए चेतावनी की घंटी है। एक प्राइवेट बैंक द्वारा शुरू किए गए ई-वॉलेट में मामूली चूक का फायदा उठाते हुए पांच इंजीनियरिंग छात्रों ने 8.6 करोड़ रुपए की बड़ी चोरी को अंजाम दे दिया। ऐसे में सरकार को डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा देने से पहले इसकी सुरक्षा को पुख्ता बनाने पर जोर देने की जरूरत है।
ऑनलाइन पेमेंट का बढ़ा चलन
सरकार भारत को कैशलेस इकोनॉमी बनाना चाहती है और उसका असर दिखने भी लगा है। यही वजह है कि देश में चेक और ड्राफ्ट से ज्यादा ऑनलाइन पेमेंट होने लगे हैं। डिजिटल वॉलेट का चलन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती डिजिटल पेमेंट सिस्टम की खामियों को दूर करना है। देश में लगातार डिजिटल वॉलेट और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन जैसे सर्विस के लूपहोल का फायदा उठाकर लोग करोड़ों रुपए की चपत लगाने में कामयाब हो रहे हैं।
5 इंजीनियरिंग छात्रों ने लूटे 8.6 करोड़ रुपए
देश में ई-वॉलेट्स और डिजिटल वॉलेट्स का इस्तेमाल बड़ी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन ये सर्विस अभी असुरक्षित और खामियों से भरी है। इसकी वजह से हैकर्स और असामाजिक तत्व कभी भी इन खामियों का फायदा उठा सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक-डकैती ने बैंकों और ई-वॉलेट कंपनियों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। हाल में ही कोलकाता के 5 इंजीनियरिंग छात्रों ने प्राइवेट बैंक के वॉलेट में सेंध लगाकर बड़ी लूट को अंजाम देने में कामयाब रहे। इससे पहले की बैंक अधिकारी इसका पता लगा पाते छात्रों ने कई महीने में 8.6 करोड़ रुपए की चपत लगा दी।
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ऐसे दिया ई-डकैती को अंजाम
दिसंबर 2015 में देश के एक प्रसिद्ध बैंक ने डिजिटल वॉलेट लॉन्च किया और ग्राहकों के लिए वॉलेट-टू-वॉलेट कैश ट्रांसफर की सुविधा दी। इस पूरी प्रक्रिया में बैंक को सिक्योरिटी लूपहोल का पता नहीं चला। इस सर्विस की सबसे बड़ी खामी ये थी कि अगर किसी प्राप्तकर्ता का इंटरनेट कनेक्शन बंद है तो भेजने वाले के अकाउंट से पैसे नहीं कटते हैं, लेकिन बैंक भुगतान कर देता था। उदाहरण से इसे समझते हैं। जैक ने अपने ई-वॉलेट से 1000 रुपए एलिन को भेजे। जब जैक ने पैसे भेजे तब एलिन के मोबाइल पर इंटरनेट कनेक्शन बंद था। इस मामले में, जब एलिन ने अपना मोबाइल ऑन किया तब बैंक ने उसे 1000 रुपए का भुगतान कर दिया और जैक के एकाउंट से बैंक ने एक भी रुपया नहीं काटा। इस बड़ी खामी को इंजीनियरिंग छात्र जेवेल राणा ने पकड़ा और उसने पांच अन्य छात्रों के साथ गैंग बनाकर चार महीने में बैंक से 8.6 करोड़ रुपए की बड़ी राशि चुरा ली।
हमारे सिस्टम की बड़ी खामियां
मामले की जांच करते हुए पुलिस दंग रह गई, जब उसे पता चला कि छात्रों ने हजारों फर्जी सिम कार्ड का इस्तेमाल बैंक अकाउंट खुलवाने के लिए किया है। इस अकाउंट का इस्तेमाल ई-वॉलेट से पैसे चुराने में किया गया। जेवेल और उसके गैंग के अन्य साथी मुर्शिदाबाद से प्री-एक्टिवेट सिम लेने में कामयाब हुए और इसकी मदद से 2000 बैंक अकाउंट खोले। इससे उन्होंने 18,000डिजिटल वॉलेट्स बनाकर इस चोरी को अंजाम दिया। इससे पता चलता है हमारे सिस्टम में कितनी खामियां है। कोई भी आसानी से मोबाइल सिम हासिल कर सकता है। जब तक सरकार शुरू से लेकर अंत तक सारी प्रक्रिया को सुरक्षित नहीं बना देती, तब तक भारत में डिजिटल इकोनॉमी का सपना साकार होना मुश्किल ही नहीं जोखिम से भी भरा है।
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