फेडरल रिजर्व साल 2025 में पहली बार कर सकता है ब्याज दरों में कटौती, भारत पर क्या होगा असर?
अमेरिकी केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व (फेड) की बुधवार को मीटिंग है जिसमें ब्याज दर पर नई घोषणाएं हो सकती हैं, जिसका असर आने वाले दिनों में भारत सहित दुनियाभर में भी देखने को मिल सकता है।
अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व इस बुधवार को 2025 की पहली ब्याज दर कटौती की घोषणा कर सकता है। यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था दोहरे दबाव यानी बढ़ती महंगाई और धीमी होती रोजगार वृद्धि का सामना कर रही है। SAN न्यूज के मुताबिक, जानकारों का कहना है कि अमेरिका मुद्रास्फीतिजनित मंदी की तरफ बढ़ रहा है, जहां आर्थिक विकास धीमा है लेकिन महंगाई तेज बनी हुई है।
0.25% की हो सकती है कटौती
सीएमई फेडवॉच टूल के मुताबिक, फेड से 0.25 प्रतिशत की कटौती की उम्मीद की जा रही है। यह अनुमान 30-दिन की फेड फंड्स फ्यूचर्स प्राइसिंग पर आधारित है। QI रिसर्च की सीईओ और फेड की पूर्व सलाहकार डेनिएल डी मार्टिनो बूथ का कहना है कि फेड बाजारों को चौंकाना पसंद नहीं करता, और इस कटौती की उम्मीद पहले ही बाजार में शामिल हो चुकी है। फेड का दोहरा लक्ष्य है, एक तरफ महंगाई को 2% के स्तर पर कंट्रोल रखना और दूसरी तरफ रोजगार के अवसर बढ़ाना। हालांकि, ये दोनों लक्ष्य अक्सर एक-दूसरे के विपरीत काम करते हैं। बूथ के अनुसार, इस बार फेड की प्राथमिकता रोजगार है, लेकिन पॉवेल महंगाई के जोखिमों को नजरअंदाज नहीं करेंगे।
इन वजहों से घट सकता है ब्याज
श्रम बाजार में कमजोरी
खबर के मुताबिक, हाल ही में जारी अगस्त की रोजगार रिपोर्ट बताती है कि देश में सिर्फ 22,000 नई नौकरियां जुड़ीं, जो कि पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम हैं। इसके अलावा, बेरोजगारी दर में 0.1% की बढ़ोतरी भी दर्ज की गई। बूथ ने कहा कि जून 2025 में पहली बार महामारी के बाद रोजगार में गिरावट आई है, जिसे फेड नजरअंदाज नहीं कर सकता।
महंगाई अब भी बड़ी चिंता
फेड का पसंदीदा महंगाई मापदंड, व्यक्तिगत उपभोग व्यय, अब बढ़कर 2.6% के करीब पहुंच गया है, जो कि फेड के 2% लक्ष्य से ऊपर है। इसी तरह, सीपीआई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। महंगाई के लिए मुख्य कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए आयात शुल्क (टैरिफ्स) को माना जा रहा है। इंडेक्स फंड एडवाइजर्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट मार्क हिगिंस ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर अब दरें घटाईं गईं और महंगाई दोबारा भड़की, तो उसे काबू में लाना बेहद कठिन हो जाएगा।
ट्रंप का दबाव
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार फेड पर दबाव डाल रहे हैं कि वह जल्दी और अधिक दरें घटाए। हालांकि, चेयरमैन जेरोम पॉवेल का कहना है कि टैरिफ के चलते फेड को अधिक सतर्कता से कदम उठाना पड़ रहा है। हिगिंस ने कहा कि फेड की स्वायत्तता और विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। ट्रंप की राजनीतिक दखलअंदाजी 1970 के दशक की 'ग्रेट इन्फ्लेशन' की याद दिलाती है। उन्होंने चेताया कि अगर फेड ने पिछले साल ही सख्ती दिखाई होती, तो अब की स्थिति इतनी जटिल नहीं होती। महंगाई जितनी देर तक बनी रहती है, उसे नियंत्रित करने के लिए उतनी ही सख्त नीतियों की जरूरत पड़ती है।
भारत पर फेड के फैसले का क्या असर पड़ता है?
जब अमेरिका का केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व, अपनी ब्याज दरें घटाता है, तो इसका असर सिर्फ अमेरिका तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। फेड के इस कदम से भारत पर कई तरह के सकारात्मक और कुछ संभावित नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
भारत को मिल सकते हैं ये फायदे
डॉलर में कमजोरी, रुपये में मजबूती: फेड की दरें घटने से अमेरिकी निवेश पर मिलने वाला रिटर्न कम हो जाता है, जिससे वैश्विक निवेशक अधिक मुनाफे की तलाश में भारत जैसे देशों की ओर रुख करते हैं। इस वजह से डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में मजबूती आ सकती है। रुपये का मजबूत होना भारत के लिए अच्छा है, क्योंकि इससे आयात (जैसे कि कच्चा तेल) सस्ता होता है, जिससे देश में महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
शेयर बाजार और बॉन्ड मार्केट को बढ़ावा: विदेशी निवेशकों (एफपीआई/एफआईआई) का पूंजी प्रवाह बढ़ने से भारतीय शेयर बाजार में उछाल आ सकता है। बाजार में अधिक लिक्विडिटी आने से शेयरों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके अलावा, सरकारी और कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में भी विदेशी निवेश बढ़ने की संभावना है, जिससे इन बाजारों को भी बल मिलेगा।
आरबीआई के लिए रास्ता साफ: अगर फेड अपनी दरें घटाता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को भी अपनी मौद्रिक नीति में बदलाव करने का मौका मिल सकता है। वैश्विक महंगाई और पूंजी प्रवाह के अनुकूल रहने पर, आरबीआई के लिए भी दरों में कटौती करना आसान हो जाएगा। इससे भारत में कर्ज सस्ता हो सकता है, जो अर्थव्यवस्था में निवेश और उपभोग को बढ़ावा देगा और आर्थिक विकास को गति देगा।
क्या भारत के लिए चुनौतियां भी हैं?
वैश्विक अनिश्चितता का खतरा: अगर वैश्विक स्तर पर महंगाई उम्मीद से अधिक बनी रहती है, या भू-राजनीतिक तनाव (जैसे व्यापार युद्ध या तेल की कीमतों में अचानक उछाल) बढ़ता है, तो डॉलर में मजबूती बनी रह सकती है। ऐसे में भारत को विदेशी पूंजी प्रवाह में अचानक कमी या उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है, जिससे बाजार अस्थिर हो सकता है।
विदेशी निवेश पर निर्भरता: अगर विदेशी निवेशक सिर्फ कम ब्याज दरों के कारण भारत में आ रहे हैं, तो वैश्विक आर्थिक स्थिति बदलते ही वे अपनी पूंजी तेजी से वापस भी खींच सकते हैं। यह भारत के वित्तीय बाजारों के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है।
