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Hindi News पैसा बिज़नेस किरायेदार अब मकान मालिक की मालिकाना हक पर नहीं कर सकेंगे दावा, जानें प्रॉपर्टी ओनर के अधिकार

किरायेदार अब मकान मालिक की मालिकाना हक पर नहीं कर सकेंगे दावा, जानें प्रॉपर्टी ओनर के अधिकार

यह फैसला न केवल मकान मालिकों के अधिकारों को मजबूती देता है, बल्कि भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए एक कानूनी मिसाल भी स्थापित करता है, जहां किरायेदार मालिकाना हक को चुनौती देते हैं।

आमतौर पर, भारत में किराए में हर साल लगभग 10% की वृद्धि होती है।- India TV Paisa Image Source : PIXABAY आमतौर पर, भारत में किराए में हर साल लगभग 10% की वृद्धि होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में मकान मालिकों के अधिकारों को बल देते हुए कहा है कि कोई भी किरायेदार, जो किसी संपत्ति का कब्जा वैध किरायानामा (रेंट एग्रीमेंट) के तहत लेता है, बाद में मालिक की स्वामित्व पर सवाल नहीं उठा सकता या विरोधी कब्जे के आधार पर उस संपत्ति पर अधिकार नहीं जता सकता। news18 की खबर के मुताबिक, यह फैसला 1953 से चल रहे एक पुराने किरायेदारी विवाद (ज्योति शर्मा बनाम विष्णु गोयल) में सुनाया गया। यह फैसला जस्टिस जे. के. महेश्वरी और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिया, जिसने ट्रायल कोर्ट, अपील अदालत और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों को पलट दिया।

क्या है मामला

खबर के मुताबिक, विवाद उस दुकान से जुड़ा था जो वर्ष 1953 में रामजी दास से किरायेदारों के पूर्वजों ने किराये पर ली थी। वर्षों तक किराया रामजी दास और बाद में उनके उत्तराधिकारियों को दिया जाता रहा। 1953 के एक रिलीन्क्विशमेंट डीड और 12 मई 1999 की वसीयत (विल) के अनुसार, संपत्ति का स्वामित्व ज्योति शर्मा, यानी रामजी दास की बहू को मिला। ज्योति शर्मा ने दुकान को अपने परिवार के मिठाई और नमकीन व्यवसाय के विस्तार के लिए खाली कराने की मांग की। दूसरी तरफ, किरायेदारों (मूल किरायेदार के पुत्रों) ने उनके मालिकाना हक को चुनौती देते हुए दावा किया कि यह संपत्ति वास्तव में रामजी दास के चाचा सुआलाल की थी और वसीयत जाली है।

सुप्रीम कोर्ट का कमेंट और नतीजा

सुप्रीम कोर्ट ने किरायेदारों के इन दावों को “मनगढ़ंत” और “सबूतों से रहित” बताया। कोर्ट ने एक्ज़िबिट P-18, यानी 1953 के रिलीन्क्विशमेंट डीड का उल्लेख करते हुए कहा कि किरायेदारों ने वर्षों तक रामजी दास और उनके उत्तराधिकारियों को किराया दिया है, जो स्पष्ट रूप से मकान मालिक-किरायेदार संबंध को स्थापित करता है। पीठ ने कहा- जब कोई किरायेदार वैध किरायानामे के तहत संपत्ति का कब्जा स्वीकार करता है और किराया चुकाता है, तो वह मकान मालिक के स्वामित्व को चुनौती देने से रोका जाता है। कोर्ट ने 2018 की प्रॉबेट कार्यवाही को भी सही ठहराया और वसीयत में पत्नी को शामिल न किए जाने के आधार पर उसके वैधता पर संदेह करने से इनकार किया, यह कहते हुए कि ऐसा करना कोई उचित कारण नहीं है।

किरायेदारों को छह महीने की मोहलत

अदालत ने किरायेदारी की लंबी अवधि को ध्यान में रखते हुए किरायेदारों को छह महीने का समय दिया है, ताकि वे बकाया किराया चुकाकर संपत्ति खाली करें और कब्जा सौंप दें। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि किरायेदारी के तहत मिला कब्जा अनुमत होता है, शत्रुतापूर्ण नहीं। यह फैसला मकान मालिकों के अधिकारों को सशक्त करता है और यह तय करता है कि किरायेदार विरोधी कब्जे या मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकते, अगर उन्होंने कभी वैलिड किरायानामा यानी रेंट एग्रीमेंट स्वीकार किया हो।

जानें मकान मालिक के क्या हैं कानूनी अधिकार

housing.com के मुताबिक, भारत में किरायेदारी को किराया नियंत्रण अधिनियम और मॉडल किरायेदारी अधिनियम, 2020 जैसे भवनों के तहत नियंत्रित किया जाता है। मकान मालिक के स्वामित्व में कई प्रमुख अधिकार दिए गए हैं, मकान मालिकों के स्वामित्व में वृद्धि, किरायेदार को बेदख़ल करना और मकान के लिए मकान मालिक के कब्जे में लेना जैसे अधिकार शामिल हैं।

किराया बढ़ाने का अधिकार

कानून के अनुसार, मकान मालिक को अपनी संपत्ति का बाजार मूल्य (बाजार दर) तय करने और समय-समय पर इसको बढ़ाने का अधिकार है। आमतौर पर, भारत में किराए में हर साल लगभग 10% की वृद्धि होती है। हालांकि, किराए की यह कैटेगरी राज्य-विशिष्ट किराया कानून से संबंधित है, यानी हर राज्य के अपने नियम हो सकते हैं। मॉडल टेनेंसी एक्ट, 2020 में किराए पर रहने, संशोधन और भुगतान से जुड़ी कई अनुचित बातों को स्पष्ट किया गया है।

किरायेदार को बेदख़ल करने का अधिकार

  • किराया नियंत्रण अधिनियम के तहत, मकान मालिक किरायेदार को निम्न परिस्थितियों में बेदख़ल कर सकते हैं -
  • अगर किरायेदार संपत्ति का कोई हिस्सा किसी तीसरे व्यक्ति को किराए पर देता है।
  • इसके अलावा, रेंट एग्रीमेंट में तय किसी नियम का उल्लंघन करने पर ऐसा कर सकता है।
  • जब मकान मालिक स्वयं या अपने परिवार के लिए संपत्ति का उपयोग करना चाहता हो।
  • मकान मालिक का नाम "प्रोग्रेसिव रेंट इंक्रीमेंट क्लॉज (प्रोग्रेसिव इंक्रीमेंट क्लॉज)" में जोड़ा जा सकता है, ताकि अगर किरायेदार समय पर खाली घर न करे, तो मकान मालिक स्वतः बढ़ रहे हैं।

मरम्मत के लिए अस्थायी कब्जे का अधिकार

अगर किसी संपत्ति में एक किरायेदारी या रखरखाव कार्य (मरम्मत और रखरखाव कार्य) की आवश्यकता है, जो किरायेदार के रूप में रहना संभव नहीं है, तो मकान मालिक को अस्थायी रूप से किरायेदार को बाहर करने का अधिकार है। पूरा कार्य पूरा होने के बाद, मकान मालिक संपत्ति किरायेदार को फिर से किराए पर दे सकता है।

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