देश की गिग इकॉनमी तेजी से फैल रही है। डिलीवरी पार्टनर, कैब ड्राइवर, फ्रीलांसर, कंटेंट क्रिएटर और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े लाखों वर्कर्स आज शॉर्ट-टर्म और फ्लेक्सिबल काम पर निर्भर हैं। लेकिन बढ़ती महंगाई, अनियमित कमाई और मौसम की मार ने इनकी आर्थिक सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में गिग वर्कर्स की निगाहें अब बजट 2026 पर टिकी हैं, जिससे उन्हें सिर्फ राहत नहीं बल्कि स्थायी सुरक्षा की उम्मीद है।
मौसम की मार से इनकम पर संकट
हाल के वर्षों में बाढ़, हीटवेव और अचानक मौसम बदलाव ने गिग वर्कर्स की कमाई को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। बाहर काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर या ड्राइवर अगर एक-दो दिन भी काम नहीं कर पाते, तो उनकी आय सीधे शून्य हो जाती है। Plutas.AI के फाउंडर अंकुर इंद्रकुश के मुताबिक, मौजूदा सरकारी बीमा योजनाएं ज्यादातर नुकसान के बाद मुआवजे पर केंद्रित हैं, जबकि जरूरत तुरंत इनकम सपोर्ट की है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पैरामेट्रिक क्लाइमेट इंश्योरेंस जैसे मॉडल, जो मौसम डेटा के आधार पर ऑटोमैटिक भुगतान करें, गिग वर्कर्स को समय पर राहत दे सकते हैं।
युवाओं को चाहिए फाइनेंशियल फ्लेक्सिबिलिटी
गिग इकॉनमी में बड़ी संख्या युवा प्रोफेशनल्स की है, जो स्किल अपग्रेडेशन, कोर्सेज और करियर शिफ्ट पर लगातार निवेश कर रहे हैं। स्केलर के को-फाउंडर अभिमन्यु सक्सेना का मानना है कि बजट 2026 में युवाओं के लिए टैक्स राहत, सस्ती एजुकेशन फाइनेंसिंग और डिजिटल करियर पाथवे को बढ़ावा देने वाले कदम अहम होंगे। इससे युवा गिग वर्कर्स बिना आर्थिक दबाव के अपने भविष्य में निवेश कर सकेंगे।
डिजिटल लोन पर भरोसा, लेकिन सुरक्षा जरूरी
आज कई गिग वर्कर्स कैश फ्लो मैनेज करने के लिए डिजिटल लोन पर निर्भर हैं। Stashfin की को-फाउंडर श्रुति अग्रवाल कहती हैं कि आसान क्रेडिट के साथ उपभोक्ता सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। बजट में पारदर्शी नियम, जिम्मेदार लेंडिंग और मजबूत शिकायत निवारण सिस्टम पर फोकस होना चाहिए। साथ ही, टेक्नोलॉजी और ऑप्शनल डेटा के जरिए गिग वर्कर्स को फॉर्मल क्रेडिट सिस्टम से जोड़ने की जरूरत है।
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