कभी-कभी जिंदगी किसी इंसान की परीक्षा इतनी कठिन ले लेती है कि हर बार हार के बाद आगे बढ़ना नामुमकिन सा लगने लगता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो हर नाकामी को आखिरी नहीं, अगली सीढ़ी मानते हैं। ऐसी ही एक इंस्पायरिंग कहानी ShareChat के को-फाउंडर अंकुश सचदेवा की है, जिनकी जिंदगी यह साबित करती है कि डिग्री से ज्यादा जरूरी होती है जिद और किस्मत से ज्यादा ताकत मेहनत की होती है।
IIT से उम्मीदें, पर हकीकत में नाकामियां
अंकुश सचदेवा ने कानपुर IIT से पढ़ाई की। आमतौर पर IIT का नाम सुनते ही शानदार नौकरी और सुनहरा भविष्य आंखों के सामने आ जाता है। लेकिन अंकुश के लिए यह रास्ता आसान नहीं था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने अलग-अलग स्टार्टअप आइडिया और प्रोजेक्ट्स में करीब 17 बार असफलता का सामना किया। हर बार लगा कि शायद अब आगे बढ़ना मुश्किल है, लेकिन उन्होंने हार मानने से इनकार कर दिया।
बार-बार गिरकर भी नहीं छोड़ा सपना
लगातार असफलताओं के बावजूद अंकुश ने अपने सपने को मरने नहीं दिया। वे समझ चुके थे कि भारत में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो अंग्रेजी नहीं जानते लेकिन अपनी भाषा में डिजिटल प्लेटफॉर्म चाहते हैं। यही सोच आगे चलकर उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी। उन्होंने इस गैप को पहचाना और एक ऐसे प्लेटफॉर्म की कल्पना की, जो भारतीय भाषाओं में लोगों को जोड़ सके।
ShareChat का जन्म और बड़ी उड़ान
साल 2015 में अंकुश सचदेवा ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर ShareChat की शुरुआत की। यह एक देसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म था, जो भारतीय भाषाओं में कंटेंट शेयर करने का मौका देता है। शुरुआत धीमी रही, लेकिन धीरे-धीरे यह ऐप लाखों लोगों की पसंद बन गया। आज ShareChat देश के सबसे बड़े भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में शामिल है।
40,000 करोड़ की कंपनी
आज ShareChat की वैल्यूएशन करीब ₹40,000 करोड़ बताई जाती है। यह सिर्फ एक कंपनी की सफलता नहीं, बल्कि उस सोच की जीत है जो कहती है कि असफलता अंत नहीं होती। 17 बार फेल होने वाला वही IITian आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है। अंकुश सचदेवा की कहानी हर उस युवा के लिए है, जो बार-बार असफल होने के बाद खुद पर शक करने लगता है।
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