हर साल बजट पेश करते समय देश की नजरें वित्त मंत्री पर टिकी होती हैं, लेकिन भारत के संसदीय इतिहास में कई बार ऐसा भी हुआ जब बजट पेश करने की जिम्मेदारी खुद प्रधानमंत्री को उठानी पड़ी। यह कोई परंपरा नहीं थी, बल्कि हालात ऐसे बन गए थे कि देश के सर्वोच्च कार्यकारी को संसद में खड़े होकर आर्थिक रोडमैप रखना पड़ा। उस दिन बजट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं था, बल्कि राजनीतिक संकट, प्रशासनिक मजबूरी और संवैधानिक जिम्मेदारी की कहानी भी अपने भीतर समेटे हुए था। आखिर ऐसा क्या हुआ था कि प्रधानमंत्री को वित्त मंत्री की कुर्सी संभालनी पड़ी? चलिए जानते हैं।
पंडित जवाहरलाल नेहरू
देश का पहला ऐसा मौका 1958 में आया। तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को 'मुंद्रा स्कैंडल' (आजाद भारत का पहला बड़ा वित्तीय घोटाला) में नाम आने के बाद इस्तीफा देना पड़ा था। बजट सिर पर था और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के पास नया मंत्री खोजने का वक्त नहीं था। तब नेहरू ने खुद वित्त मंत्रालय का प्रभार लिया और बजट पेश किया। बजट भाषण शुरू करते हुए उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा था कि एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जिसमें एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह काम (बजट पेश करना) करना पड़ रहा है।
इन्होंने भी प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए पेश किया था बजट
- इंदिरा गांधी (1970): इंदिरा गांधी ने अपने वित्त मंत्री मोरारजी देसाई से मतभेदों के चलते 1970 में उन्हें पद से हटा दिया था। इसके बाद इंदिरा ने खुद वित्त मंत्रालय अपने पास रखा। इसी साल उन्होंने बजट पेश करने वाली पहली महिला बनकर इतिहास रच दिया। उनके इस बजट में गरीबी हटाओ और बैंकों के राष्ट्रीयकरण की झलक साफ दिखी थी।
- राजीव गांधी (1987):1987 में राजीव गांधी के कैबिनेट में वी.पी. सिंह वित्त मंत्री थे। दोनों के बीच बोफोर्स और अन्य मुद्दों को लेकर कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि सिंह को पद से हटा दिया गया। राजीव गांधी ने खुद बजट पेश किया। इसी बजट के दौरान उन्होंने कॉर्पोरेट टैक्स को लेकर कुछ बड़े बदलाव किए थे, जो आज भी चर्चा में रहते हैं।
क्या फिर आ सकती है ऐसी नौबत?
संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री कभी भी किसी भी मंत्रालय का प्रभार अपने पास रख सकते हैं। हालांकि, वर्तमान दौर में आर्थिक पेचीदगियां इतनी बढ़ गई हैं कि एक पूर्णकालिक वित्त मंत्री की जरूरत हमेशा बनी रहती है। लेकिन नेहरू, इंदिरा और राजीव द्वारा पेश किए गए ये बजट हमें याद दिलाते हैं कि जरूरत पड़ने पर देश का नेतृत्व 'नंबरों के खेल' को भी बखूबी संभाल सकता है।
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