ऑनलाइन शॉपिंग के दौर में ‘नो-कॉस्ट EMI’ आज सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। मोबाइल फोन हो, लैपटॉप, टीवी या फिर फर्नीचर हर प्रोडक्ट के साथ बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है Zero Interest। ग्राहक सोचता है कि बिना ब्याज के किस्तों में भुगतान करके वह समझदारी भरा फैसला ले रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि यही नो-कॉस्ट ईएमआई धीरे-धीरे आपकी जेब पर भारी पड़ सकती है। शून्य ब्याज के दावे के पीछे कई ऐसे काले सच छिपे हैं, जिन्हें जानना हर ग्राहक के लिए जरूरी है।
सच नंबर 1: ब्याज आप ही चुकाते हैं, बस तरीके बदले होते हैं
नो-कॉस्ट ईएमआई में यह भ्रम दिया जाता है कि बैंक ब्याज नहीं ले रहा। असल में बैंक ईएमआई पर पूरा ब्याज वसूलता है। फर्क सिर्फ इतना है कि विक्रेता या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म उस ब्याज की रकम को डिस्काउंट बताकर एडजस्ट कर देता है। यानी जो छूट आपको दिखती है, वही असल में ब्याज की भरपाई होती है। कई मामलों में यह छूट अन्य अट्रैक्टिव ऑफर्स की कीमत पर दी जाती है।
सच नंबर 2: दूसरे ऑफर्स चुपचाप हो जाते हैं गायब
नो-कॉस्ट ईएमआई चुनते ही कई बार इंस्टेंट कार्ड डिस्काउंट, कैशबैक या बैंक ऑफर हट जाते हैं। ग्राहक यह सोचता है कि वह ब्याज बचा रहा है, लेकिन अगर वह एकमुश्त भुगतान करता तो उसे ज्यादा सीधी छूट मिल सकती थी। कई उपभोक्ताओं का एक्सपीरिएंस है कि ईएमआई पर लिया गया प्रोडक्ट अंत में उतना ही या उससे ज्यादा महंगा पड़ा।
सच नंबर 3: छिपी फीस और क्रेडिट स्कोर पर असर
नो-कॉस्ट ईएमआई के साथ प्रोसेसिंग फीस और उस पर लगने वाला GST भी जुड़ सकता है। इसके अलावा ईएमआई लेने से आपकी क्रेडिट लिमिट और एक्सपोजर बढ़ता है, जिसका असर भविष्य में होम लोन या पर्सनल लोन लेते समय पड़ सकता है। समय पर किस्त न चुकाने की स्थिति में आपका क्रेडिट स्कोर भी खराब हो सकता है।
समझदारी क्या है?
खरीदारी से पहले ईएमआई और एकमुश्त भुगतान दोनों की कुल लागत की तुलना जरूर करें। यह देखें कि ईएमआई लेने से कहीं आप कोई बड़ा डिस्काउंट तो नहीं खो रहे। साथ ही अपनी आय, भविष्य की जरूरतों और क्रेडिट प्रोफाइल को ध्यान में रखकर ही फैसला लें।
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