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Hindi News विदेश एशिया EXCLUSIVE: प्रधानमंत्री का निष्कासन, हिंसा और फिर 1.5 साल में पारदर्शी चुनाव होकर नई का सरकार बनना बांग्लादेश के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि? एक्सपर्ट से समझिए

EXCLUSIVE: प्रधानमंत्री का निष्कासन, हिंसा और फिर 1.5 साल में पारदर्शी चुनाव होकर नई का सरकार बनना बांग्लादेश के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि? एक्सपर्ट से समझिए

Bangladesh Poll Result: बांग्लादेश में अवामी लीग के बायकॉट के बावजूद 60 फीसदी मतदान ने सभी राजनीतिक अनुमान फेल कर दिए। शेख हसीना के बिना बने इस नए सिस्टम और भारत के कूटनीतिक रुख पर क्या बोले साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट डॉ. श्रीश पाठक, जानिए इस खास रिपोर्ट में।

अस्थिरता के सवालों के...- India TV Hindi Image Source : AP अस्थिरता के सवालों के बीच शांतिपूर्ण चुनाव बांग्लादेश की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है।

Bangladesh Election Results: बांग्लादेश में शेख हसीना के बगैर हुए आम चुनाव 2026 ने कई राजनीतिक मिथकों को तोड़ दिया। अवामी लीग के बायकॉट के बावजूद 60 प्रतिशत वोटिंग होना क्या बांग्लादेश की सियासत में एक नए चैप्टर की शुरुआत है? और सबसे बड़ा सवाल- ढाका में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई BNP सरकार के साथ भारत के रिश्ते अब क्या करवट लेंगे? इन तमाम सवालों का जवाब जानने के लिए INDIA TV ने Exclusive बात की साउथ एशिया मामलों के एक्सपर्ट डॉ. श्रीश पाठक से। उन्होंने बताया कि भारत की परिपक्व कूटनीति कैसे बांग्लादेश में हो रहे इस बदलाव से सामंजस्य बैठाने सक्षम है।

सवाल- बांग्लादेश के आम चुनाव में 60 फीसदी लोगों ने वोट डाला, हिंसा की छोटी-मोटी खबरों को छोड़ दें तो अधिकतर जगहों पर शांतिपूर्ण मतदान हुआ। बांग्लादेश में शेख हसीना के बिना हुए इस चुनाव के बाद आप बांग्लादेश की राजनीति को कैसे बदलता हुआ देख रहे हैं?

जवाब- डॉक्टर श्रीश पाठक ने कहा कि बांग्लादेश की राजनीति में यह शायद दूसरी या तीसरी बार है जब किसी बड़ी पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया है या उसे लड़ने नहीं दिया गया है। अगर हम पिछले ऐसे चुनावों से तुलना करें, तो आप जो वोटिंग प्रतिशत बता रहे हैं, वह अब तक का सबसे बेहतरीन आंकड़ा माना जाएगा। इसमें Gen-Z की भागीदारी एक सकारात्मक पहलू है, हालांकि वहां छात्र राजनीति हमेशा से सक्रिय रही है। अगर वोटिंग ऊपर रहा है, तो यह माना जाना चाहिए कि एक बड़े हिस्से ने इसमें भाग लिया है।

उन्होंने आगे कहा, 'हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि यह केवल आम चुनाव नहीं था, बल्कि एक तरह का जनमत संग्रह भी था, जिस वजह से शायद वोटिंग प्रतिशत बढ़ा हो। छिटपुट हिंसा को छोड़ दें, तो युवाओं के नेतृत्व में चुनाव का शांतिपूर्ण होना सराहनीय है। हालांकि, मैं अभी बहुत ज्यादा सकारात्मक नहीं हूं, लेकिन आज जिस तरह चुनाव हुए हैं, उसकी तारीफ करनी होगी।'

सवाल- आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि करीब 20 प्रतिशत वोटरों ने मतदान से दूरी बनाए रखी। क्या हम यह मान सकते हैं कि यह 'साइलेंट वोटर' अवामी लीग का समर्थक है जो डर के मारे बाहर नहीं निकला? अगर समाज का इतना बड़ा हिस्सा खुद को नई व्यवस्था से अलग-थलग महसूस करेगा, तो क्या यह नई सरकार के लिए भविष्य में खतरा नहीं बनेगा?

जवाब- डॉक्टर श्रीश पाठक ने कहा कि चुनाव हमेशा 'ब्लैक एंड व्हाइट' नहीं होते। पार्टियों के अपने वोट बैंक होते हैं, लेकिन दुनिया भर में 'स्विंग वोटर्स' भी होते हैं जो किसी एक पार्टी के पक्के समर्थक नहीं होते। इसलिए, जो 20% लोग वोट देने नहीं आए, जरूरी नहीं कि वे सभी अवामी लीग के ही समर्थक हों। हो सकता है कि उन्होंने बस वोट न देने का फैसला किया हो।

उन्होंने आगे कहा कि जिन्होंने वोट दिया, वे शायद नई व्यवस्था के साथ जाना चाहते हैं। वास्तविक वोटिंग व्यवहार तो परिणाम की घोषणा के कुछ हफ्तों बाद ही समझ आएगा। रही बात खतरे की, तो यह इस पर निर्भर करेगा कि सरकार का स्वरूप कैसा बनता है।

सवाल- 2024 में जब बीएनपी ने चुनाव का बहिष्कार किया था, तो उनके समर्थकों ने उसका पालन किया था। वोटिंग टर्नआउट तब 40 फीसदी के करीब नीचे पहुंच गया था। लेकिन क्या अब अवामी लीग की पकड़ इतनी कमजोर हो गई है कि उनके बहिष्कार के आह्वान के बावजूद 60 फीसदी वोटिंग हो गई?

जवाब- डॉक्टर श्रीश पाठक ने कहा कि 1996 में जब अवामी लीग ने बहिष्कार किया था, तब वोटिंग प्रतिशत लगभग 21 प्रतिशत ही था। मैं यह इसलिए बता रहा हूं ताकि हम अवामी लीग की मौजूदा स्थिति को समझ सकें। बीएनपी के साथ यह हुआ कि उनकी 'सेकेंड जनरेशन' को जमीन तैयार मिली और वे मौजूदा माहौल के साथ तालमेल बिठा पाए। लेकिन इस बार अवामी लीग की सेकेंड जनरेशन को खड़े होने का मौका ही नहीं मिला।

उन्होंने आगे कहा कि जब नेता और पार्टी दोनों ही गायब हैं, तो यह कहना मुश्किल है कि उनका जनाधार बचा है या नहीं। अगर हम यह मान लें कि उनका समर्थन पूरी तरह खत्म हो गया है, तो यह जल्दबाजी होगी, क्योंकि नेतृत्व की अनुपस्थिति में समर्थकों का आकलन करना कठिन है।

सवाल- 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के निष्कासन के बाद, बांग्लादेश जैसे अस्थिरता वाले देश में यह चुनाव संपन्न होना कितनी बड़ी उपलब्धि है? इस चुनाव को कराने में देश के सामने क्या बड़ी चुनौतियां थीं?

जवाब- डॉक्टर श्रीश पाठक ने कहा कि 2024 की घटना के बाद बांग्लादेश पर सबसे बड़ा दबाव अंतरराष्ट्रीय निगरानी का है। पूरी दुनिया और खास तौर पर भारत, जो अल्पसंख्यकों के मुद्दों को सही उठाता रहा है, की नजर उन पर है। सरकार की तरफ से कोई भी चूक स्थिति को बिगाड़ सकती थी। इस तनाव और दबाव के बावजूद, अगर चुनाव बिना बड़ी हिंसा के संपन्न हुए हैं, तो यह वास्तव में बांग्लादेश के लिए एक उपलब्धि है। भारत भी एक पड़ोसी के तौर पर शांतिपूर्ण चुनावों की सराहना कर रहा है।

सवाल- बांग्लादेश में BNP की सरकार बनने जा रही है, इसका भारत से रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा? भारत को इस घटनाक्रम पर लगातार नजर क्यों रखनी चाहिए?

जवाब- डॉक्टर श्रीश पाठक ने कहा कि भारतीय कूटनीति अब काफी परिपक्व हो चुकी है। भारत ने बदलते हालातों को समझा है और आज भी दोनों देशों के बीच 'ट्रैक-1' या 'ट्रैक-2' के जरिए संवाद जारी है। भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि बांग्लादेश भारत को नजरअंदाज नहीं कर सकता, चाहे वहां किसी भी विचारधारा की सरकार हो। यही भारत के लिए सबसे बड़ा पक्ष है। भारत ने भी कोई सख्त रवैया नहीं अपनाया है और न ही संवाद तोड़ा है। हमने यह सीख लिया है कि हमें किसी एक 'प्रो-इंडिया' सरकार के भरोसे नहीं रहना है, बल्कि जो भी सत्ता में आए, उसके साथ कूटनीतिक रिश्ते रखने हैं। इसलिए, मुझे नहीं लगता कि भारत की तरफ से अब कोई चूक होगी।

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