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EXCLUSIVE: भेदभाव रोकने वाले नियम खुद भेदभाव वाले कैसे? सुप्रीम कोर्ट में UGC नियमों के खिलाफ पक्ष रखने वाले वकील से समझें एक-एक बात

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Feb 02, 2026 01:41 pm IST,  Updated : Feb 17, 2026 03:11 pm IST

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। इन नियमों में क्या खामियां हैं, ये बात सुप्रीम कोर्ट में CJI के सामने UGC ड्राफ्ट रेगुलेशन के खिलाफ दायर याचिका का पक्ष रखने एडवोकेट पार्थ यादव से समझिए।

UGC New Regulations- India TV Hindi
UGC के नए नियमों के खिलाफ याचिका दायर करने वालों को उसमें क्या कमियां नजर आती हैं। Image Source : PTI

UGC New Regulations: कॉलेज और यूनिवर्सिटी में 'भेदभाव' रोकने के लिए UGC नए नियम लाई, लेकिन फिर उन्हें ही भेदभाव वाला बताकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। आरोप लगा कि ये नए नियम संविधान के आर्टिकल 14 'समानता के अधिकार' का उल्लंघन करते हैं। समाज को बांट सकते हैं। भेदभाव की परिभाषा सिर्फ एक विशेष वर्ग तक सीमित नहीं हो सकती, तो फिर सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी। इस पूरे मामले को समझने के लिए INDIA TV ने इस मामले में याचिकाकर्ता राहुल दीवान के वकील पार्थ यादव से विस्तार से बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि UGC के नए नियमों को 'एकतरफा' क्यों कहा जा रहा है और स्टूडेंट लाइफ में जातिगत राजनीति की एंट्री कैसे खतरनाक हो सकती है।

सवाल- सुप्रीम कोर्ट में आपकी मुख्य दलील यह थी कि UGC के नए नियम 'एकतरफा' हैं। एक आम आदमी के लिए आसान भाषा में समझाएं कि कैसे भेदभाव के खिलाफ बना कानून खुद भेदभावपूर्ण हो सकता है?

जवाब- एडवोकेट पार्थ यादव ने कहा कि हमारा मुख्य मुद्दा क्लॉज 3(1)(c) है। इसमें 'कास्ट डिस्क्रिमिनेशन' की जो परिभाषा दी गई है, वह न तो न्याय सम्मत है और न ही संविधान के अनुरूप है। यह परिभाषा बहुत संकीर्ण है और इसमें माना गया है कि भेदभाव केवल कुछ ही लोगों के साथ हो सकता है। जबकि क्लॉज 3(e) में 'डिस्क्रिमिनेशन' की जो परिभाषा है, वह संविधान के मुताबिक है।

उन्होंने कहा, 'हमारा तर्क यह है कि भेदभाव किसी के साथ भी हो सकता है, चाहे वह कोई भी हो, जो समाज में कम शक्तिशाली है। डिस्क्रिमिनेशन को संकीर्ण मानसिकता से नहीं, बल्कि व्यापक रूप में देखा जाना चाहिए। इसलिए हमने क्लॉज 3(1)(c) को चुनौती दी क्योंकि यह अभी के स्वरूप में गैर-संवैधानिक है।'

सवाल- संविधान का अनुच्छेद 14 समानता की बात करता है। आपके मुताबिक, UGC का यह नया ड्राफ्ट जनरल कैटेगरी के छात्रों को उनके मौलिक अधिकारों से कैसे वंचित कर रहा था?

जवाब- एडवोकेट पार्थ यादव ने कहा कि इसे केवल किसी एक विशेष वर्ग को टारगेट करने के रूप में नहीं, बल्कि समग्र रूप में देखा जाना चाहिए। जैसा कि मैंने बताया, क्लॉज 3(1)(c) की परिभाषा बहुत संकीर्ण है। हमारा कहना है कि कानून सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए। सामाजिक पूर्वाग्रहों को ध्यान में रखते हुए, सभी छात्रों के लिए- चाहे वे किसी भी यूनिवर्सिटी में हों, एक समान कानून होना चाहिए।

सवाल- सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि UGC के नए नियमों की भाषा अस्पष्ट है। बतौर वकील, आपको इन नियमों के किस क्लॉज Clause में सबसे ज्यादा खामी दिखी?

जवाब- एडवोकेट पार्थ यादव ने कहा कि इसकी सबसे बड़ी खामियों में क्लॉज 3(1)(c) है, जिसमें भेदभाव की परिभाषा बहुत संकीर्ण है। दूसरी समस्या क्लॉज 8(b) और 8(c) में है, जिसमें पीनल एक्शन यानी क्रिमिनल कार्रवाई के लिए कमिटी द्वारा निर्देश दिए जा सकते हैं। इसका दुरुपयोग हो सकता है, जिससे समाज में अराजकता फैल सकती है। इसका फायदा उठाकर बाहरी या अनैतिक ताकतें हिंदू समाज को बांट सकती हैं।

सवाल- सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है। अगर भविष्य में यूजीसी को नए नियम ड्राफ्ट करने पड़ते हैं, तो आप क्या बदलाव देखना चाहेंगे?

जवाब- एडवोकेट पार्थ यादव ने कहा कि क्लॉज 3(1)(c) को हटाया जाए। हम चाहते हैं कि भेदभाव की वह परिभाषा लागू हो जो क्लॉज 3(1)(e) में दी गई है। नियम सभी वर्गों के छात्र-छात्राओं के समान प्रोटेक्शन के लिए होने चाहिए। हम चाहेंगे कि इस पर विचार-विमर्श और शास्त्रार्थ करके इसे पूरी तरह से न्याय सम्मत और संवैधानिक रूप से दोबारा ड्राफ्ट किया जाए।

सवाल- यह कहा जा रहा है कि 2012 वाले रेगुलेशन बेहतर थे, इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फिर से लागू किया है। इसमें क्या सच्चाई है?

जवाब- एडवोकेट पार्थ यादव ने कहा कि पुराना वाला अच्छा था या बुरा, यह अभी विषय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पुराना नियम इसलिए लागू किया क्योंकि नए नियमों पर स्टे लग गया है और शिक्षण संस्थानों में गाइडलाइंस का होना जरूरी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में 'इक्विटी' होनी चाहिए, इसलिए अंतरिम उपाय के तौर पर पुराने नियमों को बहाल रखा गया है।

सवाल- क्या कोर्ट में आपकी लड़ाई केवल परिभाषा और नए नियमों की भाषा स्पष्ट होने तक सीमित है, या आप चाहते हैं कि शिक्षण संस्थानों में शिकायत निवारण समिति के स्ट्रक्चर में भी बदलाव हो?

जवाब- एडवोकेट पार्थ यादव ने कहा कि देखिए सबसे पहले तो एक चीज ये बता दें, हम सभी छात्र रहे हैं, हम सभी ने कॉलेज में, यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की है। मैं भी दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ा हूं। जहां तक कि हम सबका आईडिया है, 21वीं शताब्दी में, छात्र जीवन में एक छात्र दूसरे छात्र से ये कभी नहीं पूछता है कि आप कौन सी जाति से हैं। हम सब आपस में मिलजुलकर रहते हैं, एक ही साथ खाना खाते हैं, पानी पीते हैं, एक ही हॉस्टल के रूम में रहते हैं। उसमें मौज-मस्ती जैसी चीजें भी होती हैं। पढ़ाई भी सब एक साथ ही करते हैं।

उन्होंने कहा, 'ये कहा जाए कि इससे छात्रों पर क्या असर पड़ेगा, मुझे नहीं लगता कि छात्र इन सब के बारे में इतना सोचते भी हैं। ये जो रेगुलेशन्स हैं, ये स्टूडेंट कल्चर के विरुद्ध हैं। उसपर निगेटिव इफेक्ट डालेंगे। उसको रोकने के लिए हमने ये याचिका दायर की थी जिसमें उच्चतम न्यायालय ने रोक लगाई है।'

सवाल- आपके मुताबिक, यूजीसी का नया रेगुलेशन हिंदू समाज में दरार डाल सकता है, इससे नई असमानता कैसे पैदा हो सकती है?

जवाब- एडवोकेट पार्थ यादव ने कहा कि सबसे पहले तो एक चीज मैं बोलना चाहता हूं, सभी को अपना मानना हर हिंदू का संस्कार है। हमारे सबके माता-पिता ने, पूर्वजों ने हमें ये संस्कार दिया है। संस्कृत का एक श्लोक है- 'अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।' मतलब कि जिसकी संकीर्ण मानसिकता है, वो ये सोचता है कि ये मेरा है, ये पराया है। पर जिसका चित्त बड़ा है, वो ये सोचता है कि पूरा संसार मेरा परिवार है।

उन्होंने कहा, 'हर हिंदू का ये एक मूल संस्कार है। तो दरार आना, ना आना, आज तक जिस तरीके से राजनीति चली है, वो एक अलग चीज है, दरार डालकर चली है। लेकिन ये जो रूल्स बने थे, इसमें डर ये था कि कहीं वही पुरानी राजनीति और सोच दोबारा ना आ जाए और हिंदू समाज को किसी तरीके से डिवाइड या विभाजित करे।'

एडवोकेट पार्थ यादव ने बताया कि जिस तरीके से हिंदुओं को बांटकर राजनीति की गई है, चाहे वो अंग्रेजों के काल में हो या मुगलों के काल में, इस देश में बाहर के लोगों ने सत्ता तब पाई जब उन्होंने हमें बांटा। और जो शब्द 'कास्ट' है, उसका जाति से मतलब नहीं है। जाति का मतलब होता है स्पीशीज, अगर उसको अंग्रेजी में ट्रांसलेट करें तो 'कास्ट' पोर्तुगीज शब्द है, उसका मूल रूप है 'कास्टा'। जो लैटिन रूट 'कास्टा' से आता है, तो कास्ट डिवीजन होना हमारे यहां कभी संस्कार नहीं था।

उन्होंने आगे कहा कि चूंकि हमारे ऊपर लोगों को राज करना था और उनकी बहुत ही कुंठित सोच थी, तो उन्होंने हमें कैटेगरीज में, वर्गों में बांटा, जिसको उन्होंने कास्ट कहा और हम आज तक ये सोचते आ रहे हैं कि हमें भी उसी प्रकार से रहना है।

सवाल- सुप्रीम कोर्ट के इस स्टे में उन छात्रों के लिए क्या संदेश है जो UGC के इन नियमों को भेदभावपूर्ण मानते थे?

जवाब- एडवोकेट पार्थ यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही न्यायोचित काम किया है। उन्होंने समाज के आक्रोश और छात्रों की चिंताओं को समझते हुए यह फैसला दिया है। एक संवैधानिक पद पर बैठे न्यायमूर्ति के निर्णय का सम्मान करना हम सबका कर्तव्य है।

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