अरवलः बिहार विधानसभा चुनाव से पहले अरवल में चुनावी माहौल काफी गरम है। सभी पार्टियां राजनीतिक गतिविधियां कर रही है। यह निर्वाचन क्षेत्र एक सामान्य सीट है। भाकपा (माले) (एल) और भाजपा इस निर्वाचन क्षेत्र में मुख्य दल हैं। 2020 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (लिबरेशन) के महा नंद सिंह ने बीजेपी को हराकर जीत दर्ज की थी। इस बार यहां से चुनावी मुकाबला काफी दिलचस्प रहने वाला है। प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी पहली बार चुनावी मैदान में उतर रही है। बिहार विधानसभा चुनाव 6 और 11 नवंबर 2025 को होगा और 14 नवंबर को चुनाव के नतीजे आएंगे।
अरवल के बारे में जानिए
अरवल पहले जहानाबाद जिले का हिस्सा था और अगस्त 2001 में इसे अलग जिले के रूप में बनाया गया था। बिहार के 38 जिलों में अरवल तीसरा सबसे कम आबादी वाला जिला है। यहां के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि ही है। इस जिले की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है। इस जिले में 335 गांव हैं। जिले में अनुसूचित जातियों की आबादी 20.16 प्रतिशत है। हिंदुओं की आबादी 90.48 प्रतिशत है, जबकि मुसलमानों की आबादी 9.17 प्रतिशत है। मगही 86.53 प्रतिशत निवासियों की प्राथमिक भाषा है।
अरवल सीट का चुनावी इतिहास
अरवल के मतदाताओं ने पिछले चार चुनावों में चार अलग-अलग दलों के प्रतिनिधियों को चुना है। यानी पिछले 20 साल से जो दल एक बार जीता उसे यहां पर लगातार दूसरी बार मौका नहीं मिला। अरवल ने 17 बार अपने विधायक चुने हैं, जिनमें से सबसे चार बार निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत मिली है। भाकपा, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने दो-दो बार यह सीट जीती है, जबकि सोशलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा और भाकपा (माले) (एल) ने एक-एक बार यह सीट जीती है। 2020 के विधानसभा चुनाव में भाकपा (माले) (एल) ने अरवल सीट पर भाजपा को 19,950 मतों से हराकर आसानी से जीत हासिल की।
साल 2020 में CPI(ML)(L), 2015 में आरजेडी को यहां से जीत हासिल हुई थी। 2010 में बीजेपी ने यहां से जीत दर्ज की थी। 2005 में एलजेपी को जीत मिली थी। 2000 में आरजेडी ने जीत दर्ज की थी। 1995 में जनता दल को जीत मिली थी। 1990, 1985, 1980 में निर्दलीय को जीत मिली थी।