बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए गठबंधन जिन सीटों को सबसे सुरक्षित आंक रहा होगा, उनमें अस्थावां का नाम सबसे ऊपर होगा। इस सीट पर नीतीश कुमार का प्रभाव साफ दिखाई देता है। वह जब से बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं, उसके बाद से कभी भी जेडीयू यहां नहीं हारी है। 1951 में बनी यह सीट नालंदा लोकसभा सीट में शामिल सात विधानसभा सीटों में से एक है। यहां 18 बार चुनाव हो चुके हैं और बीजेपी या आरजेडी अब तक जीत नहीं हासिल कर पाई हैं। इस बार यहां छह नवंबर को मतदान होना है।
नीतीश कुमार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी होने पर यहां के समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि, बिहार में अब तक ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में एक बार फिर यहां से जेडीयू उम्मीदवार की जीत तय नजर आ रही है।
कब किसे मिली जीत?
1951 में बनी आस्थावां विधानसभा सीट पर 18 चुनाव हुए हैं। इनमें 2001 का उपचुनाव भी शामिल है। 2001 से यह सीट जेडीयू के खाते में ही रही है। जेडीयू लगातार छह बार इस सीट पर जीत हासिल कर चुकी है। इस सीट पर पांच बार निर्दलीय उम्मीदवार भी जीत चुके हैं। 1985 से 2000 के बीच लगातार चार बार इस सीट से निर्दलीय उम्मीदवार विधानसभा चुनाव जीते थे। हालांकि, नीतीश के सीएम बनने के बाद से यह सीट जेडीयू का गढ़ बन गई। कांग्रेस यहां चार बार, जनता पार्टी दो बार, प्रजा शोसलिस्ट पार्टी एक बार यहां से जीत चुकी है।
क्या हैं समीकरण?
अस्थावां में जेडीयू के जितेंद्र कुमार मौजूदा विधायक हैं। उनके परिवार के अलावा यहां से निर्दलीय उम्मीदवार ही ज्यादा चुनाव जीते हैं। जितेंद्र कुमार लगातार पांच बार यहां से चुनाव जीत चुके हैं। उनके पिता अयोध्या प्रसाद भी 1972 से 1982 के बीच कांग्रेस के टिकट पर लगातार चुनाव जीते थे। 2024 लोकसभा चुनाव में भी जेडीयू के उम्मीदवार को अस्थावां में बढ़त मिली थी। ऐसे में एक बार फिर यहां से जेडीयू उम्मीदवार की जीत तय मानी जा रही है।
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