"कौन जाने ये तमन्ना इश्क की मंजिल में है।
जो तमन्ना दिल से निकली फिर जो देखा दिल में है।।"
बिस्मिल यह शेर सुनकर मुस्करा दिये तो अशफाक ने पूछ ही लिया-"क्यों राम भाई! मैंने मिसरा कुछ गलत कह दिया क्या?" इस पर बिस्मिल ने जबाब दिया- "नहीं मेरे कृष्ण कन्हैया! यह बात नहीं। मैं जिगर साहब की बहुत इज्जत करता हूँ मगर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब की पुरानी जमीन पर घिसा पिटा शेर कहकर कौन-सा बड़ा तीर मार लिया। कोई नयी रंगत देते तो मैं भी इरशाद कहता।"
अशफाक को बिस्मिल की यह बात जँची नहीं। उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा- "तो राम भाई! अब आप ही इसमें गिरह लगाइये, मैं मान जाऊँगा आपकी सोच जिगर और मिर्ज़ा गालिब से भी परले दर्जे की है।" उसी वक्त पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' ने ये शेर कहा-
"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है?"
यह सुनते ही अशफाक उछल पड़े और बिस्मिल को गले लगा के बोले- "राम भाई! मान गये, आप तो उस्तादों के भी उस्ताद हैं।" संक्षेप में सरफरोशी की तमन्ना की रचना की पृष्ठभूमि का यही वास्तविक इतिहास है।
बॉलिवुड में देशभक्ति के ऊपर बनी कई फिल्मों में इस गीत का इस्तेमाल किया जा चुका है। सबसे पहले इस कविता का प्रयोग सन् 1965 में भगत सिंह के जीवन पर आधारित फिल्म 'शहीद' में किया गया था जिसमें मनोज कुमार मुख्य भूमिका में थे। मन्ना डे और मोहम्मद रफी ने उन शब्दों को अपनी आवाज़ दी थी।
सन् 2002 में आई फिल्म 'द लीजेण्ड ऑफ भगतसिंह' में कुछ पंक्तियों में फेरबदल के साथ इस गाने का उपयोग किया गया था। अजय देवगन ने भगत सिंह का किरदार निभाया था वहीं सोनू निगम ने अपनी सुरीली आवाज़ से इस गीत में जोश भरा।
2006 में आई फिल्म रँग दे बसन्ती में भी कविता के रूप में इस गीत को इस्तेमाल किया गया था।
तीन साल बाद अनुराग कश्यप की फिल्म गुलाल में काट-छाँट के साथ पैरोडी के रूप में इस गाने को पेश किया गया था।
आज पंडित राम प्रसाद बिसमिल जी की जन्मदिन की सालगिराह पर हम उन्हें सलाम करते है उन्हीं कि लिखी हुई इस गज़ल के साथ -
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