'क्या तू सच में निर्दोष है?' बालासाहेब ठाकरे का वो सवाल, जिसे सुनते ही अमिताभ बच्चन को खानी पड़ी पिता की कसम
अमिताभ बच्चन और ठाकरे परिवार की नजदीकियां किसी से छिपी नहीं है। एक दौर ऐसा आया था, जब अमिताभ सिर झुकाए मदद मांगने के लिए बालासाहेब ठाकरे के पास पहुंचे थे और उनके एक सवाल ने अमिताभ को पिता की कसम खाने पर मजबूर कर दिया था।

राजनीति और सिनेमा जब आमने-सामने आते हैं, तब सिर्फ घटनाएx नहीं बनतीं, बल्कि इतिहास के ऐसे किस्से जन्म लेते हैं जो समय के साथ किंवदंती बन जाते हैं। ऐसे ही एक किस्से की चर्चा आज फिर से हो रही है, मौका है शिवसेना प्रमुख रहे बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी का। इस अवसर पर मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने ‘सामना’ अखबार में एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने बालासाहेब के व्यक्तित्व, उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ और निर्णायक नेतृत्व का एक बेहद दिलचस्प प्रसंग साझा किया है। यह प्रसंग जुड़ा है देश के सबसे बड़े राजनीतिक घोटालों में से एक बोफोर्स घोटाले और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से।
अमिताभ से ठाकरे का सवाल
राज ठाकरे लिखते हैं कि बोफोर्स घोटाले के दौरान देश का माहौल बेहद उथल-पुथल भरा था। अखबारों की सुर्खियां, संसद की गहमागहमी और सियासी आरोप-प्रत्यारोप हर तरफ छाए हुए थे। इसी दौरान अमिताभ बच्चन का नाम भी इस घोटाले से जोड़ा जाने लगा। देशभर में उनकी तीखी आलोचना हो रही थी और यह दौर उनके लिए मानसिक रूप से बेहद परेशान करने वाला था। इसी तनाव के बीच एक दिन अमिताभ बच्चन अपने भाई अजिताभ बच्चन के साथ मातोश्री पहुंचे। राज ठाकरे के मुताबिक उस दिन अमिताभ बेहद चिंतित नजर आ रहे थे। जैसे ही वे बालासाहेब के सामने बैठे, बालासाहेब ने बिना भूमिका बांधे सीधा सवाल दाग दिया, 'क्या तू सच में निर्दोष है?'
अमिताभ का जवाब
यह सवाल सिर्फ एक राजनीतिक नेता का नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का था जो सच को परखना जानता था। अमिताभ बच्चन ने बिना हिचक अपने पिता हरिवंशराय बच्चन की कसम खाते हुए कहा कि बोफोर्स घोटाले से उनका कोई लेना-देना नहीं है। बालासाहेब ने उनकी आंखों में झांका, कुछ पल सोचा और फिर तुरंत एक ठोस कदम उठाया। बालासाहेब ने अमिताभ से कहा कि वे तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह को एक पत्र लिखें। सिर्फ सुझाव ही नहीं दिया, बल्कि उस पत्र का मसौदा भी खुद तैयार करके दिया। राज ठाकरे बताते हैं कि बालासाहेब को न केवल राजनीति की गहरी समझ थी, बल्कि अंग्रेजी भाषा पर भी उनकी मजबूत पकड़ थी। वे जानते थे कि प्रधानमंत्री को पत्र किस लहजे में और किस भाषा में लिखा जाना चाहिए।
बालासाहेब का निर्णायक कदम
अमिताभ बच्चन ने वही पत्र वीपी सिंह को भेजा और इसके बाद धीरे-धीरे माहौल शांत होने लगा। मीडिया का शोर कम हुआ और अमिताभ के खिलाफ चल रहा दबाव भी घटता चला गया। राज ठाकरे इस पूरे घटनाक्रम को बालासाहेब का करिश्मा बताते हैं, एक ऐसा नेता जो सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता रखता था। गौर करने वाली बात यह भी है कि यह लेख ऐसे समय में लिखा गया है जब मनसे और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हैं। खासकर केडीएमसी में शिंदे गुट को मनसे द्वारा दिए गए समर्थन से उद्धव ठाकरे नाराज बताए जा रहे हैं। ऐसे राजनीतिक माहौल में बालासाहेब के नेतृत्व और निर्णय क्षमता का यह स्मरण सिर्फ एक किस्सा नहीं, बल्कि शायद एक संदेश भी है।
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