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Bhool Bhulaiyaa Vs Bhooth Bangla: 'भूल भुलैया' से किन मामलों में पीछे रह गई 'भूत बंगला', तगड़ी कॉमेडी के बाद भी मिसिंग हैं कल्ट बनाने वाली 5 बातें

Bhool Bhulaiyaa Vs Bhooth Bangla: 'भूल भुलैया' से क्या 'भूत बंगला' बेहत है? फिल्म देखने के बाद ये सवाल जरूर मन में आएगा कि अक्षय की हालिया फिल्म में क्या कमियां रह गई हैं।

bhool bhulaiyaa bhoot bangla- India TV Hindi
Image Source : STILL FROM BHOOL BHULAIYAA, BHOOT BANGLA अक्षय, परेश और राजपाल।

अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी ने सालों बाद 'भूत बंगला' के जरिए बड़े पर्दे पर वापसी तो की है, लेकिन क्या यह फिल्म 'भूल भुलैया' जैसी कल्ट क्लासिक बन पाएगी? सिनेमाघरों में भारी भीड़ और जबरदस्त कॉमेडी के बावजूद दर्शकों के मन में एक बड़ा सवाल तैर रहा है। कुछ ऐसी बारीक और बुनियादी कमियां हैं, जो इस फिल्म को उस ऐतिहासिक ऊंचाई तक पहुंचने से रोक रही हैं। निर्देशन की पकड़ से लेकर गानों के जादू तक आखिर वह कौन सी 5 खास बातें हैं जो इस बार मिसिंग नजर आ रही हैं? क्या 'वधुसुर' का खौफ 'मंजुलिका' के मनोवैज्ञानिक रोमांच का मुकाबला कर पाएगा या फिर कमजोर पटकथा इस बंगले की नींव हिला देगी?

निर्देशन में चूकी भूत बंगला

'भूल भुलैया' की कहानी बंधी हुई थी और इसमें कोई बिखराव नहीं था। कहानी दिशाहीन नहीं होती और बिल्कुल सही ढर्रे पर चलती है, हर सीन सिंक में था यानी फिल्म फ्लो में चलती हैं, पैना निर्देशन नजर आता है, लेकिन 'भूत बंगला' में इसकी कमी है। शुरुआत जोरदार होती है। शुरुआती 45 मिनट हंसी का पूरा डोज मिलता है, लेकिन कहानी किसी दिशा की ओर बढ़ती नहीं दिखती और ऐसी फीलिंग आने लगती है कि इंटरवल कब आएगा। कहानी बिखर जाती है, संतुलन बिगड़ता है। इस बार प्रियदर्शन का पैना निर्देशन मिसिंग है।

स्क्रीन प्ले में रह गई कमी

'भूल भूलैया' का स्क्रीन प्ले नीरज वोहरा ने किया था, कहा जाता था कि वो जिस भी फिल्म का स्क्रीन प्ले रचते थे, उसका चलना तय रहता था। यही वजह थी कि 'भूल भुलैया' का स्क्रीन प्ले सधा हुआ था और फिल्म एक बार भी ट्रैक से नहीं उतरती थी। फिल्म की कहानी से एक मिनट के लिए भी नजर हटाने का दिल नहीं चाहता था। 'भूत बंगला' का स्क्रीन प्ले उतना मजबूत नहीं है और कई जगहों पर लेखन कमजोर पड़ता है और नीरज वोहरा की कमी काफी खलती है।

क्लाइमैक्स बहुत मजबूत था

'भूल भुलैया'का क्लाइमैक्स बहुत मजबूत था। फिल्म की कहानी आपको यकीन दिला देती है कि भूत जैसी कोई चीज नहीं होती बल्कि एक साइकोलॉजिकल बीमारी है, लेकिन 'भूत बंगला' का क्लाइमैक्स इस इतर लोक कथाओं, तंत्र विद्या, जादू टोना और भूत जैसी चीजों को सच के तौर पर स्टैब्लिश करने की कोशिश करता है। 'भूल भूलैया' के क्लाइमेक्स तक सस्पेंस बना रहता है और अब क्या होगा जानने की चाहत रहती है, लेकिन 'भूत बंगला' में आप पहले ही कहानी गेस कर लेंगे।

तर्क संगत फिल्म थी

'भूल भुलैया' में सभी चीजें लॉजिक के इर्द-गिर्द बुनी गई थीं, जबकि 'भूत बंगला' कल्पना को तर्क के साथ पेश नहीं कर पाई है। एक ओर दिखाया गया है कि वधुसुर रोशनी से डरता है, दूसरी ओर यज्ञ-हवन में हो रही आग की रोशनी से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। इसके अलावा मिथिला का किरदार एक पढ़ी लिखी लड़की का है जो लंदन में रहती है, लेकिन बिल्कुल रूढ़िवादी लड़के से शादी करने के लिए सब त्यागने को तैयार है। 

गाने ऐसे नहीं कि याद रह जाएं

'भूल भुलैया' के गाने सालों बाद भी जेहन में हैं। 'मेरे ढोलना', 'हरे कृष्मा हरे राम', 'लेट्स रॉक सोनियो', 'अल्ला हाफिज' और 'लबो को' आज भी लोगों की जुबां पर चढ़े रहते हैं, लेकिन 'भूत बंगला' में एक भी गाना ऐसा नहीं है जो आपके साथ थिएटर से बाहर आए, जिसे आप फिल्म देखने के बाद भी गुनगुनाए। सिर्फ एक गाना 'राम जी आकर भला करेंगे' ही थोड़ा असर छोड़ सकता है।

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