EXCLUSIVE: बेटी का हांथ सौंपने से पहले रश्मिका के माता-पिता ने विजय के लिए की खास पूजा, निभाई अलग-अलग रस्में, दामाद के रूप में किया शाही स्वागत
रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा की शादी से जुड़ी अपडेट लगातार सामने आ रही हैं। शादी की रस्में शुरू होने से पहले रश्मिका के परिवार ने विजय का शाही वेलकम किया है और उनके लिए एक खास पूजा भी की।
रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा की शादी संपन्न हो गई है। तेलुगु रीति-रिवाजों के अनुसार कपल की शादी संपन्न हुई। इसके बाद अब कुर्गी रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की जाएगा। इस दौरान शादी से जुड़ी कई अपडेट सामने आ रही हैं। इंडिया टीवी को एक्सक्लूसिव जानाकारी मिली है कि विजय देवरकोंडा का खास अंदाज में स्वागत किया गया। इतना ही नहीं रश्मिका मंदाना के माता-पिता ने उनके लिए एक स्पेशल पूजा रखी, जिसमें उन्हें पूरी तरह से दामाद के रूप में स्विकार किया गया। इस दौरान विजय देवरकोंडा का सम्मान भी किया गया। तेलुगु रिति-रिवाजों के अनुसार दामाद के लिए खास पूजा लड़की के माता पिता करते हैं।
विजय के लिए रश्मिका के परिवार ने निभाई अलग-अलग रस्में
सूत्र से मिली जानकारी के अनुसार तेलुगु संस्कृति में विवाह को केवल एक सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मिलन माना जाता है, जिसमें दूल्हे यानी दामाद को साक्षात 'भगवान विष्णु' का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। रश्मिका मंदाना के परिवार द्वारा विजय देवरकोंडा के लिए की गई यह विशेष पूजा 'वर पूजा' और 'एदुरुकोल्लू' जैसी प्राचीन परंपराओं का हिस्सा है। रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा की शादी में इसकी झलक देखने को मिली है।
वर पूजा: 'महाविष्णु' के रूप में दामाद का सत्कार
तेलुगु परंपरा के अनुसार विवाह की मुख्य रस्मों से पहले वधू पक्ष द्वारा दूल्हे की 'वर पूजा' की जाती है। इसमें वधू के पिता या भाई दूल्हे के पैर धोते हैं, जिसे 'पाशालु' कहा जाता है। यह रस्म इस विश्वास पर आधारित है कि बेटी का हाथ सौंपने से पहले वे उस व्यक्ति की पूजा कर रहे हैं जो उनके घर की लक्ष्मी का रक्षक बनेगा। इसके बाद दूल्हे को नए वस्त्र, फल और चंदन अर्पित कर उनका तिलक किया जाता है, जो उनके प्रति परिवार के सर्वोच्च सम्मान को दर्शाता है। ये खास पूजा रश्मिका के माता पिता ने विजय के साथ परफॉर्म की।
एदुरुकोल्लू: द्वार पर भव्य स्वागत और मर्यादा
जब विजय बारात लेकर पहुंचे तो उनका एदुरुकोल्लू रस्म के साथ भव्य स्वागत किया गया। बता दें, इस रस्म में जब दूल्हा बारात के साथ विवाह स्थल पर पहुंचता है तो 'एदुरुकोल्लू' की रस्म निभाई जाती है। रश्मिका के परिवार ने विजय को जो पान, नारियल, हल्दी और कुमकुम भेंट किया है, वह इसी रस्म का मुख्य हिस्सा है। यह उपहार खुशहाली और संपन्नता के प्रतीक माने जाते हैं। इस दौरान दूल्हे की आरती उतारी जाती है ताकि उसे किसी भी प्रकार की बुरी नजर से बचाया जा सके और पूरे गाजे-बाजे के साथ उसे मंडप तक लाया जाता है।
काशी यात्रा: संन्यास से गृहस्थ जीवन की ओर
तेलुगु शादियों में 'काशी यात्रा' एक अत्यंत रोचक और प्रतीकात्मक रस्म है। इसमें दूल्हा हाथ में छाता, चप्पल और लाठी लेकर यह स्वांग रचता है कि वह सांसारिक मोह त्यागकर 'काशी' (संन्यास) जा रहा है। तब वधू के पिता उसे रोकते हैं और अपनी पुत्री का हाथ उसे सौंपने का वचन देकर गृहस्थ जीवन अपनाने के लिए मनाते हैं। इस मान-मनौव्वल के बाद दूल्हे की फिर से विशेष पूजा की जाती है और उसे अत्यंत आदर के साथ विवाह के मुख्य मंडप की ओर ले जाया जाता है। इस रस्म को भी रश्मिका और विजय की शादी में खास महत्व दिया गया और एक्ट्रेस के माता-पिता इसे पूरी शिद्दत से निभाते नजर आए।
स्नतकम और कंकण धारण: संकल्प की पूजा
विवाह समारोह शुरू होने से ठीक पहले 'स्नतकम' की रस्म होती है, जो इस बात का प्रतीक है कि दूल्हा अब अपने विद्यार्थी जीवन और ब्रह्मचर्य को पूर्ण कर 'गृहस्थ' बनने के लिए तैयार है। पूजा के दौरान विजय देवरकोंडा की कलाई पर एक पवित्र धागा, जिसे 'कंकणम' कहा जाता है, वो बांधा गया। यह धागा इस बात का संकल्प है कि दूल्हा और दुल्हन अब विवाह की सभी आध्यात्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा के साथ निभाएंगे।
ये भी पढ़ें: VIROSH Wedding Live Update: एक-दूजे के हुए रश्मिका मंदाना और विजय देवरकोंडा, सात जन्मों के लिए बने हमसफर
