शोर नहीं, सोच के साथ पेश की गई देशभक्ति, शानदार है ‘बिहू अटैक’ की कहानी
‘बिहू अटैक’ असम के बिहू पर्व की पृष्ठभूमि में आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा पर आधारित गंभीर थ्रिलर है। देव मेनारिया का सशक्त अभिनय और संतुलित निर्देशन फिल्म को प्रभावी बनाता है। कुछ कमियों के बावजूद, यह फिल्म देशभक्ति के साथ सामाजिक संदेश भी देती है।
असम के सांस्कृतिक पर्व बिहू की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘बिहू अटैक’ एक गंभीर विषय को छूती है—आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक एकता। यह फिल्म बड़े बजट या भव्य प्रस्तुति के बजाय कंटेंट और विषय-वस्तु पर फोकस करती है। कलाकारों की मजबूत मौजूदगी के कारण फिल्म दर्शकों का ध्यान बनाए रखने में काफी हद तक सफल रहती है।
कहानी
फिल्म की कहानी असम के एक साहसी और दृढ़ निश्चयी कोर्ट मार्शल अधिकारी राज कुंवर (देव मेनारिया) के इर्द-गिर्द घूमती है। राज हिंसा के बजाय शिक्षा और सामाजिक जुड़ाव को महत्व देता है और भटके हुए युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश करता है। पत्नी की मृत्यु के बाद वह अपनी छोटी बेटी के साथ जीवन जी रहा होता है।
कहानी उस समय गंभीर मोड़ लेती है जब रक्षा मंत्री के दौरे के दौरान बिहू फेस्टिवल पर एक बड़े आतंकी हमले की जानकारी मिलती है। पड़ोसी देश से जुड़े आतंकी संगठन स्थानीय नेटवर्क के साथ मिलकर इस हमले की योजना बनाते हैं। राज कुंवर, अपने अनुभव और पूर्व अधिकारी केडी सर के सहयोग से, इस खतरे को टालने की जिम्मेदारी उठाता है। फिल्म का क्लाइमेक्स कहानी का सबसे अहम हिस्सा है।
अभिनय
देव मेनारिया राज कुंवर के किरदार में सहज और प्रभावी नजर आते हैं। एक जिम्मेदार अधिकारी और एक अकेले पिता, किरदार के दोनों भूमिकाओं को उन्होंने संतुलन के साथ निभाया है। डेज़ी शाह सीमित स्क्रीन टाइम में ठीक-ठाक प्रभाव छोड़ती हैं। अरबाज खान आईबी चीफ के रूप में संयमित अभिनय करते हैं। राहुल देव, रज़ा मुराद, युक्ति कपूर, मीर सरवर और हितेन तेजवानी जैसे सहायक कलाकार कहानी को मजबूती देते हैं।
निर्देशन
निर्देशक सुज़ाद इक़बाल खान ने विषय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए फिल्म को संभलकर ट्रीट किया है। फिल्म कहीं-कहीं डॉक्यूमेंट्री टोन लेती है, जो इसके यथार्थवादी दृष्टिकोण को मजबूत करता है। फिल्म संदेश देती है और एंटरटेनिंग भी रहती है हालांकि कुछ दृश्य और एडिटिंग किया जा सकता था यह विषय संवेदनशील के साथ ही इमोशनल भी है इसलिए यह कह सकते है निर्देशक मनोरंजन के साथ मुख्य विषय पर अपने कंट्रोल रखा है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘बिहू अटैक’ उन दर्शकों के लिए है जो देशभक्ति को शोर के बजाय विचार के रूप में देखना पसंद करते हैं। यह फिल्म मनोरंजन के साथ-साथ सोचने का मौका भी देती है। कमजोरियों के बावजूद, अपने विषय और ईमानदार प्रस्तुति के कारण यह एक देखने योग्य प्रयास कहा जा सकता है। ‘बिहू अटैक’ केवल एक थ्रिलर नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश देने की कोशिश भी है। फिल्म यह रेखांकित करती है कि उग्रवाद से लड़ने में शिक्षा, संवाद और सामाजिक समावेशन की भूमिका अहम हो सकती है। उत्तर-पूर्व भारत की चुनौतियों को फिल्म गंभीरता से छूती है और यह बताने का प्रयास करती है कि सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय एकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।