- होम
- मनोरंजन
- मूवी रिव्यू
- तन्वी द ग्रेट
तन्वी द ग्रेट रिव्यू: एक सन्नाटा जो दिल से संवाद करता है, ठीक यही अहसास देती है अनुपम खेर की फिल्म
अनुपम खेर के निर्देशन में बनी 'तन्वी द ग्रेट' आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इस फिल्म से शुभांगी दत्ता डेब्यू कर रही हैं। फिल्म की कहानी शुभांगी और अनुपम खेर का काम कैसा है, ये जानने के लिए पढ़ें पूरा रिव्यू।
कभी-कभी कोई फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं होती, वह एक अनुभव होती है, जो आपके दिल में हल्के से दस्तक देती है, और फिर वहीं ठहर जाती है। अनुपम खेर की निर्देशन में वापसी ‘तन्वी: द ग्रेट’ एक ऐसी ही फिल्म है, यह न तो बड़े दावों के साथ आती है, न शोर मचाती है, लेकिन जब आप थिएटर से बाहर निकलते हैं तो आप थोड़ा और समझदार, थोड़ा और संवेदनशील और थोड़ा और इंसान बन चुके होते हैं। फिल्म आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इस फिल्म की कहानी कैसी है, फिल्म में क्या मोड़ आएंगे और अनुपम खेर का निर्देशन कैसा है, ये जानने के लिए आप नीचे स्क्रोल करें और पढ़ें पूरा रिव्यू।
किस दिशा जाती है कहानी
यह फिल्म किसी महान उद्देश्य या नाटकीय मोड़ से शुरू नहीं होती। इसकी शुरुआत होती है एक बेहद आम-सी परिस्थिति से, जहां एक मां विद्या रैना (पल्लवी जोशी) जो एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जा रही है और अपनी ऑटिस्टिक बेटी तन्वी (शुभांगी दत्त) को उसके दादा (अनुपम खेर) के पास लैंसडाउन में छोड़ जाती है। यहीं से एक असाधारण रिश्ता आकार लेना शुरू करता है। लैंसडाउन का शांत, ठंडा वातावरण फिल्म की थीम के विपरीत नहीं, बल्कि उसका विस्तार बनता है। जैसे पहाड़ अपने भीतर हजारों कहानियां छुपाए रहते हैं, वैसे ही इस कहानी के पात्र हैं, भीतर से जटिल, बाहर से सादे। यह फिल्म रिश्तों को सिर्फ संबंध के तौर पर नहीं, बल्कि एक जवाबदेही के रूप में देखती है। यह सिखाती है कि प्यार में शोर नहीं, समझ होती है। और समझ तब आती है जब आप सुनना सीखते हैं।
जब सपना हकीकत से टकराता है
तन्वी, जो अपने जूते के फीते तक नहीं बांध सकती, एक दिन अचानक कहती है कि वह फौज में भर्ती होना चाहती है। यह सपना उसकी सोच से नहीं, उसके भाव से पैदा होता है। अपने दिवंगत पिता के प्रति श्रद्धा और अपनी क्षमता में विश्वास से वो तय करती है कि एक फौजी बनेगी। इस सपने का बीज फिल्म बहुत पहले बो देती है और जब यह सामने आता है तो चौंकाता नहीं, बल्कि प्रेरित करता है। फिल्म यहां भी नाटकीय नहीं होती। कोई बड़े भाषण नहीं, कोई आंसुओं से लथपथ दृश्य नहीं, सिर्फ एक लड़की है जो जानती है कि यह उसका सपना है और वह इसके लिए तैयारी कर रही है।
कैसा है अनुपम खेर का काम
फिल्म रिश्तों के असल मायने भी समझाती है। फिल्म में दादा और पोती के रिश्ते को खूबसूरती से पिरोया गया है। कहानी की शुरुआत में दोनों के बीच दूरियां दिखाई गई हैं, लेकिन बीतते समय के साथ ये दूरियां विश्वास में बदल जाती हैं। एक अनुशासित, कठोर सैनिक से एक कोमल, समझदार दादा तक के सफर को अनुपम खेर ने पूरी तरह से जिया है। वो समय के साथ बदलते कर्नल रैना के रूप में परफेक्ट लगे हैं। उनका किरदार दर्शाता है कि परिवर्तन हर उम्र में संभव है, बस एक सही कारण चाहिए।
कैसा है शुभांगी का काम
बॉलीवुड में अक्सर ऑटिस्टिक किरदारों को या तो बेचारा बना दिया जाता है या फिर उनका महिमा मंडन किया जाता है। 'तन्वी द ग्रेट' इस ट्रैप में नहीं फंसती। यह फिल्म ऑटिज्म को न तो एक ‘कमी’ बताती है, न ही एक ‘उपलब्धि’। यह इसे एक अलग नजरिए के रूप में पेश करती है, जिसे समझने के लिए समय और स्नेह की जरूरत होती है। तन्वी का किरदार बेहद शांत है, लेकिन उसका हर भाव, हर प्रतिक्रिया, एक पूरी कहानी कहती है। शुभांगी दत्त का अभिनय अभिनय कम, जीवन अधिक लगता है। उनके लिए संवाद मायने नहीं रखते। उनकी आंखों से जाहिर भार, चाल, मौन रूप ही काफी हैं।
सहयोगी किरदारों का काम
ब्रिगेडियर जोशी (जैकी श्रॉफ), मेजर श्रीनिवासन (अरविंद स्वामी), संगीत शिक्षक रजा साहब (बोमन ईरानी), ये सभी किरदार नायक नहीं हैं, लेकिन नायक को दिशा देने वाले ‘साइलेंट गाइड्स’ हैं। इनका स्क्रीन टाइम सीमित है, लेकिन प्रभाव गहरा छोड़ते हैं। ये ऐसे शिक्षक हैं जो पढ़ाते नहीं, बस रास्ता दिखाते हैं और यही उन्हें खास बनाता है।
निर्देशन
अनुपम खेर, जिन्होंने इस फिल्म का निर्देशन भी किया है, यहां निर्देशक कम, कहानी के श्रोता ज्यादा लगते हैं। वह कहानी को अपना मंच नहीं बनाते, बल्कि खुद को मंच से हटा देते हैं ताकि पात्र पूरी तरह सामने आ सकें। निर्देशन की परिपक्वता इस बात में है कि फिल्म कभी ‘अनुपम खेर की फिल्म’ नहीं लगती, बल्कि ‘तन्वी की यात्रा’ लगती है। वह अभिनय भी करते हैं, लेकिन उतने ही जितना जरूरी है। उनकी भूमिका में न कोई नाटकीय ऊंचाई है, न ही ज्यादा संवाद पर उनके हर भाव, हर नजर, हर चुप्पी गूंजती है।
तकनीकी पक्ष
एमएम कीरवानी का संगीत यहां पारंपरिक ‘बैकग्राउंड स्कोर’ नहीं है। यह किरदारों की संवेदना का विस्तार है। जब तन्वी बोल नहीं पाती, तब संगीत बोलता है और बोलता भी है तो बहुत धीरे, जैसे कह रहा हो 'मैं समझ रहा हूं।' सिनेमैटोग्राफी लैंसडाउन की सुंदरता को सिर्फ दिखाती नहीं, महसूस कराती है। शांत वातावरण, हल्की रोशनी, गीली मिट्टी, सब मिलकर फिल्म की भावनात्मक लय का हिस्सा बन जाते हैं और सबसे खास बात, फिल्म मौन से डरती नहीं। जब जरूरत हुई तो कहानी से संवाद हटाकर चुप्पी दिखाई गई है। यही चुप्पी दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है।
एक फिल्म, जो बस ‘महसूस’ की जाती है
‘तन्वी: द ग्रेट’ एक सिनेमा है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा यह एक ‘भाव’ है- साहस का, समझ का और सबसे महत्वपूर्ण, उम्मीद का। यह फिल्म चिल्ला कर कुछ नहीं कहती, लेकिन धीरे-धीरे आपके भीतर उतर जाती है। यह बताती है कि हर व्यक्ति चाहे किसी भी स्थिति में हो अपने सपनों का हकदार है। यह उन फिल्मों में से है जो खत्म होने के बाद भी खत्म नहीं होतीं। आप थिएटर से निकलकर बाहर जरूर आते हैं, लेकिन तन्वी, उसकी मासूम आंखें और उसकी जिद्दी चुप्पी, आपके साथ चलती रहती हैं। बॉलीवुड आजकल जहां बड़े बजट और भारी भरकम एक्शन से भरा हुआ है, ‘तन्वी: द ग्रेट’ एक ताजगी भरी सांस की तरह है। तमाम लोगों की सोच बदलने लायक इस फिल्म को जरूर देखें।