Explainer:तेजी से पिघल रही आर्कटिक की बर्फ, यूरोप के अस्तित्व को सता रहा "आइस एज" का डर; जानें ऐसा हुआ तो क्या होगा?
आइसलैंड में तेजी से पिघल रही बर्फ ने यूरोप के अस्तित्व का खतरा बढ़ा दिया है। आर्कटिक सागर में बर्फ के बड़े-बड़े पहाड़ ग्लोबल वार्मिंग के चलते ढह रहे हैं। यह हिमयुग के खतरे को बढ़ा रहा है। इससे दुनिया भर के वैज्ञानिक चिंतित हैं। जानें अगर "आइस एज" आया तो क्या होगा?

Explainer: जलवायु परिवर्तन की मार से आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे अटलांटिक महासागर की महत्वपूर्ण धारा प्रणाली एएमओसी (अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन) कमजोर हो रही है। वैज्ञानिकों का चेतावनी है कि यदि यह धारा पूरी तरह ढह गई, तो उत्तरी यूरोप में आधुनिक "आइस एज" जैसी ठंडक छा सकती है। यानि तब यहां तापमान इतना गिर सकता है कि कृषि, ऊर्जा और अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाए। आइसलैंड ने इसे "अस्तित्वगत खतरा" घोषित कर राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा बना लिया है, जबकि अन्य यूरोपीय देश अनुसंधान तेज कर रहे हैं।
एएमओसी क्या है?
एएमओसी उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म पानी को उत्तर की ओर ले जाने वाली एक विशाल 'कन्वेयर बेल्ट' है, जो यूरोप की सर्दियों को सहनीय बनाती है। बिना इसके यूरोप का औसत तापमान 5-10 डिग्री सेल्सियस गिर सकता है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग से आर्कटिक बर्फ और ग्रीनलैंड की हिमचादर पिघल रही है, जिससे ठंडा खारा पानी महासागर में मिल रहा है। यह नमकीन गर्म पानी के डूबने को बाधित कर धारा को धीमा कर रहा है। हालिया अध्ययनों से पता चला है कि एएमओसी पहले ही 15-20% कमजोर हो चुकी है, और अगले कुछ दशकों में इसका पतन अपरिहार्य हो सकता है। यानि यह और तेजी से कमजोर हो सकती है। ऐसे में आइस एज का खतरा बढ़ सकता है।
एएमओसी (AMOC) के ढहने से यूरोप में क्या होगा?
कार्बन ब्रीफ के एक अध्ययन के अनुसार मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य (2 डिग्री ग्लोबल वार्मिंग) में उत्तरी यूरोप में गहन शीतलन (गहरी ठंडक) होगा, जो ग्रीनहाउस गैसों से होने वाली गर्मी को पूरी तरह नकार देगा। लंदन में सर्दी का औसत तापमान 1.9 डिग्री सेल्सियस रह जाएगा, जबकि चरम ठंड -19.3 डिग्री तक पहुंच सकती है। ओस्लो में औसत -16.5 डिग्री और चरम -47.9 डिग्री, एडिनबर्ग में -29.7 डिग्री, पेरिस में -18 डिग्री। स्कैंडिनेविया में -50 डिग्री से नीचे तापमान सिस्टमिक ब्रेकडाउन ला सकता है। सर्दियों में समुद्री बर्फ स्कैंडिनेविया और ब्रिटेन के तटों तक फैल जाएगी, जो सूर्य की किरणों को परावर्तित कर ठंड बढ़ाएगी। गर्मियों में तापमान प्री-इंडस्ट्रियल स्तर से थोड़ा ठंडा रहेगा, लेकिन सर्दी-गर्मी के चक्र उग्र हो जाएंगे। इससे वातावरणीय जलवायु पूरी तरह असंतुलित हो जाएगी।
12000 साल पहले हुआ था आइस एज
अगर ऐसे ही आर्कटिक की बर्फ पिघलती रही तो उत्तरी और दक्षिणी यूरोप के बीच तापमान अंतर से तूफान बढ़ेंगे और दैनिक उतार-चढ़ाव अधिक होंगे। ऐसे में आइस एज का खतरा और बढ़ेगा। इससे पहले ऐतिहासिक रूप से एएमओसी का अंतिम पतन 12,000 साल पहले आइस एज का कारण बना था। इसका प्रभाव केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों के मुताबिक यह अफ्रीका, भारत और दक्षिण अमेरिका में वर्षा पैटर्न बिगाड़ सकता है, जिससे निर्वाह किसानों की फसलें बर्बाद हो सकती हैं। अंटार्कटिका में गर्मी तेज हो सकती है, जहां समुद्री बर्फ पहले से खतरे में है।
आपदा तैयारी में तेजी लाने का आह्वान
आइसलैंड के जलवायु मंत्री जोहान पाल जोहानसन ने कहा, "यह हमारी नेशनल फ्लेक्सिबिलिटी के लिए सीधा खतरा है। हम निश्चित अनुसंधान का इंतजार नहीं कर सकते।" आइसलैंड ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में उठाया है और आपदा तैयारी नीति बना रहा है। ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, बुनियादी ढांचे और परिवहन पर जोखिम मूल्यांकन हो रहा है। अन्य देश भी सतर्क हैं। आयरलैंड ने अपने प्रधानमंत्री को ब्रीफिंग दी, वहीं नॉर्वे नए अनुसंधान कर रहा है। ब्रिटेन ने 81 मिलियन पाउंड की फंडिंग किया है। नॉर्डिक काउंसिल ने 60 विशेषज्ञों के साथ "नॉर्डिक टिपिंग वीक" आयोजित किया। जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट के स्टेफन राह्मस्टॉर्फ ने चेताया, "विज्ञान तेजी से विकसित हो रहा है, टिपिंग पॉइंट करीब है।" सितंबर 2025 में साइंस जर्नल ने एक "जाइंट डैम" के विचार पर चर्चा की, लेकिन विशेषज्ञ सहमत नहीं हैं।
तत्काल नहीं हुआ ऐक्शन तो सब हो जाएगा तबाह
जलवायु संकट के इस दौर में एएमओसी का पतन वैश्विक आपदा का प्रतीक है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम न करने पर यह "आइस एज" का नया अध्याय लिख सकता है। विशेषज्ञों का आह्वान है कि इस पर तत्काल कार्रवाई करना बहुत जरूरी है, वरना पीछे मुड़ना असंभव होगा।
आइस एज क्या है?
आइस एज (Ice Age) पृथ्वी के इतिहास में एक लंबी अवधि को संदर्भित करता है, जब पृथ्वी की सतह और वायुमंडल का तापमान इतना कम हो जाता है कि ध्रुवीय और महाद्वीपीय बर्फ की चादरें (आइस शीट्स) बड़े पैमाने पर फैल जाती हैं। यह कोई एकल घटना नहीं है, बल्कि लाखों या करोड़ों वर्षों तक चलने वाली ठंडी जलवायु चक्रों की श्रृंखला है, जिसमें ग्लेशियर (हिमनद) उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया जैसे महाद्वीपों के बड़े हिस्सों को ढक लेते हैं। अगर सरल शब्दों में कहें तो आइस एज का मतलब पृथ्वी का "ठंडा युग" यानि हिमयुग है, जहां बर्फ की मोटी परतें समुद्र स्तर को प्रभावित करती हैं, पारिस्थितिक तंत्र बदल जाते हैं और जीव-जंतु विलुप्त हो जाते हैं।
आइस एज का इतिहास और समयचक्र
पृथ्वी के 4.5 अरब वर्षों के इतिहास में कम से कम पांच प्रमुख आइस एज हुए हैं। सबसे पुराना हुरोनियन आइस एज लगभग 24 करोड़ वर्ष पहले था, जबकि सबसे हाल का क्वाटरनरी ग्लेशिएशन (Quaternary Glaciation) लगभग 25.8 लाख वर्ष पहले शुरू हुआ। इस अंतिम आइस एज में, ठंडे और गर्म चक्र (ग्लेशियल और इंटरग्लेशियल पीरियड्स) वैकल्पिक रूप से आते रहे। उदाहरण के लिए-विस्कॉन्सिन ग्लेशिएशन: लगभग 1 लाख वर्ष पहले शुरू हुआ, जो उत्तरी अमेरिका में अंतिम प्रमुख बर्फीला चरण था। अंतिम ग्लेशियल मैक्सिमम (Last Glacial Maximum): लगभग 2.1 लाख से 1.8 लाख वर्ष पहले, जब बर्फ ने पृथ्वी के 30% हिस्से को ढक लिया था। यह आइस एज लगभग 11,700 वर्ष पहले समाप्त हुआ, जब हम हॉलीसीन (Holocene) नामक गर्म इंटरग्लेशियल अवधि में प्रवेश कर चुके हैं। हालांकि, तकनीकी रूप से हम अभी भी एक आइस एज में हैं, क्योंकि ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका पर बर्फ बनी हुई है।
क्यों होता है आइस एज?
आइस एज के पीछे कई कारक जिम्मेदार हैं। इनमें से एक...
- मिलांकोविच चक्र (Milankovitch Cycles) भी है। इसमें पृथ्वी की कक्षा, अक्ष का झुकाव और घूर्णन में सूक्ष्म परिवर्तन होता है, जो सूर्य की किरणों के वितरण को प्रभावित करते हैं। ये चक्र हर 1 लाख वर्ष में आइस एज को ट्रिगर करते हैं।
- टेक्टोनिक प्लेट्स का हलचल: जब महाद्वीपों की स्थिति बदलने से महासागर धाराएं प्रभावित होती हैं।
- ज्वालामुखी विस्फोट और वायुमंडलीय गैसें: ये तापमान को कम कर सकते हैं।
- कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर: कम CO2 से ग्रीनहाउस प्रभाव कम होता है।
आइस एज होने पर क्या होता है?
आइस एज के दौरान समुद्र स्तर 120 मीटर तक गिर जाता था, जिससे भूमि पुल (जैसे बेरिंग स्ट्रेट) बन जाते थे और मनुष्य अफ्रीका से एशिया-यूरोप पहुंचे। वन्यजीवों पर असर पड़ा, जैसे मैमथ का विलुप्त होना। आज, जलवायु परिवर्तन से आइस एज के जोखिम बदल रहे हैं। कुछ वैज्ञानिक चेताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग एएमओसी जैसी धाराओं को बाधित कर नई "मिनी आइस एज" ट्रिगर कर सकती है। आइस एज पृथ्वी की प्राकृतिक जलवायु चक्र का हिस्सा है।