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Explainer: अहमदिया मुसलमानों के लिए कैसे जहन्नुम बना पाकिस्तान? निशाने पर समुदाय के लाखों लोग

पाकिस्तान में अहमदिया मुस्लिम समुदाय पर धार्मिक, कानूनी और सामाजिक अत्याचार जारी हैं। 1974 में गैर-मुस्लिम घोषित किए जाने के बाद से उन पर हिंसा, भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के मामले बढ़े हैं। पाकिस्तान में यह समुदाय अब भी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत है।

पाकिस्तान में अहमदिया...- India TV Hindi
Image Source : AP पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों की मस्जिदों को अक्सर निशाना बनाया जाता है।

Violence Against Ahmadiyya Muslims in Pakistan: पाकिस्तान में अहमदिया मुस्लिम समुदाय के खिलाफ हिंसा और भेदभाव की घटनाएं दशकों से जारी हैं। कभी उनकी मस्जिदों को निशाना बनाया जाता है तो कभी समुदाय से जुड़े लोगों की नृशंस हत्या कर दी जाती है। कुछ महीने पहले तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने तो उनकी कब्रों तक को नहीं छोड़ा और उनके साथ बेअदबी की। हाल ही में सरगोधा में एक अहमदिया डॉक्टर की हत्या ने इस समुदाय पर हो रहे अत्याचारों को फिर से उजागर किया है। आइए, समझते हैं कि आखिर पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों को इस कदर भेदभाव क्यों झेलना पड़ता है।

अहमदिया मुसलमान कौन हैं?

अहमदिया समुदाय एक धार्मिक आंदोलन है, जिसकी शुरुआत 1889 में मिर्जा गुलाम अहमद ने ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के कादियान (वर्तमान में भारत) में की थी। यह इस्लाम के भीतर एक सुधारवादी संप्रदाय के रूप में शुरू हुआ। अहमदिया समुदाय के लोग खुद को मुसलमान मानते हैं और इस्लाम के 5 मूल सिद्धांतों नमाज, रोजा, जकात, हज, और तौहीद का पालन करते हैं। हालांकि, अहमदिया समुदाय की कुछ मान्यताएं मुख्यधारा के सुन्नी और शिया मुसलमानों से अलग हैं। वे मिर्जा गुलाम अहमद को महदी और मसीहा मानते हैं, और कहीं-कहीं पैगंबर मुहम्मद को अंतिम पैगंबर नहीं मानते। यह विश्वास मुख्यधारा के मुसलमानों के बीच विवाद का मुख्य कारण है, जो पैगंबर मुहम्मद को अंतिम पैगंबर मानते हैं।

Image Source : India TVपाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों की अच्छी-खासी संख्या है।

पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर जुल्म क्यों?

पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर अत्याचार के पीछे धार्मिक, कानूनी, और सामाजिक कारण हैं:

  1. धार्मिक मतभेद: अहमदिया समुदाय की मान्यता कि मिर्जा गुलाम अहमद एक पैगंबर या महदी हैं, मुख्यधारा के मुसलमानों द्वारा अस्वीकार की जाती है। कट्टरपंथी समूह उन्हें 'काफिर' या 'मुनाफिक' मानते हैं, जिससे धार्मिक नफरत को बढ़ावा मिलता है।
  2. कानूनी भेदभाव: 1974 में पाकिस्तान की संसद ने संविधान में दूसरा संशोधन पारित कर अहमदिया समुदाय को गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया। इसके बाद 1984 में जनरल जिया-उल-हक के शासनकाल में अध्यादेश XX लागू हुआ, जिसके तहत अहमदियों को खुद को मुसलमान कहने, अपनी मस्जिदों को 'मस्जिद' कहने, अजान देने, या इस्लामी प्रथाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन करने पर रोक लगा दी गई। इसका उल्लंघन करने पर 3 साल की जेल हो सकती है।
  3. ईशनिंदा कानून का दुरुपयोग: पाकिस्तान का ईशनिंदा कानून (धारा 295-C) अहमदियों के खिलाफ अक्सर दुरुपयोग किया जाता है। इस कानून में पैगंबर मुहम्मद के अपमान के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है। अहमदियों पर इस्लाम का अपमान करने के झूठे आरोप लगाकर उन्हें निशाना बनाया जाता है। कई बार अहमदिया मुसलानों को इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ के हाथों जानमाल का नुकसान सहना पड़ा है।
  4. कट्टरपंथी समूहों की भूमिका: तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) जैसे कट्टरपंथी संगठन अहमदियों के खिलाफ नफरत फैलाते हैं और हिंसा को भड़काते हैं। टीएलपी ने अहमदियों पर ईशनिंदा के आरोप लगाकर कई हमले किए हैं।
  5. सामाजिक बहिष्कार: अहमदिया समुदाय को सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया गया है। उनकी मस्जिदों, कब्रिस्तानों, और यहां तक कि कब्रों को भी निशाना बनाया जाता है। उन्हें रोजगार, शिक्षा, और सामाजिक सेवाओं में भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

पाकिस्तान में कितने अहमदिया मुसलमान हैं?

पाकिस्तान की कुल आबादी लगभग 25 करोड़ है, जिसमें अहमदिया समुदाय की संख्या करीब 5 लाख बताई जाती है। हालांकि, कुछ स्रोतों के अनुसार उनकी संख्या 40 लाख तक हो सकती है, जो कुल आबादी का लगभग 2.2% है। 2018 में पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने बताया कि अहमदिया वोटर्स की संख्या 1.67 लाख थी। पाकिस्तान में उनकी आबादी में कमी देखी गई है, क्योंकि कई अहमदिया हिंसा और भेदभाव के कारण देश छोड़कर जा चुके हैं।

Image Source : APअहमदिया समुदाय के एक शख्स को सरकार में अहम पद देने का विरोध करते मुस्लिम कट्टरपंथी। (2018 की तस्वीर)

अहमदियों को मुसलमान क्यों नहीं माना जाता?

पाकिस्तान में अहमदियों को गैर-मुस्लिम मानने की शुरुआत 1974 में हुई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार ने संवैधानिक संशोधन (दूसरा संशोधन) पारित किया। यह कदम धार्मिक कट्टरपंथियों के दबाव में उठाया गया, जो अहमदियों की मान्यताओं को इस्लाम के खिलाफ मानते थे।

1984 में जनरल जिया-उल-हक ने अध्यादेश XX के जरिए अहमदियों पर और सख्ती की। इस कानून ने उन्हें इस्लामी प्रथाओं का पालन करने और खुद को मुसलमान कहने से रोक दिया। इसके पीछे तर्क था कि अहमदियों की मान्यताएं, खासकर मिर्जा गुलाम अहमद को पैगंबर मानना, इस्लाम की मूल मान्यता (पैगंबर मुहम्मद अंतिम पैगंबर हैं) का उल्लंघन करती हैं।

इसके अलावा, अहमदियों को अलग वोटर लिस्ट में दर्ज किया जाता है, और उन्हें गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक के रूप में माना जाता है। यह कानूनी और सामाजिक भेदभाव उन्हें मुसलमानों की मुख्यधारा से अलग करता है।

Image Source : India TVपाकिस्तान में अहमदिया मुसलमान इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर रहते हैं।

अहमदिया समुदाय पर हिंसक घटनाएं

पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर हिंसा का लंबा इतिहास है। कुछ प्रमुख घटनाएं:

  1. 2025, सरगोधा: शुक्रवार को सरगोधा में एक निजी अस्पताल में अहमदिया चिकित्सक डॉ. शेख महमूद की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह अप्रैल 2025 के बाद तीसरा हमला था। हत्या का मकसद स्पष्ट नहीं है, और संदिग्ध की तलाश जारी है।
  2. 2024, कराची: कराची के सदर इलाके में एक अहमदिया व्यक्ति को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। वह भीड़ का वीडियो बना रहा था, जिसके बाद तहरीक-ए-लब्बैक के समर्थकों ने उस पर हमला किया।
  3. 2024, रावलपिंडी: दिसंबर 2024 में एक अहमदिया व्यक्ति की कुल्हाड़ी से काटकर हत्या कर दी गई।
  4. 2021, पेशावर: 65 वर्षीय होम्योपैथी डॉक्टर अब्दुल कादिर की गोली मारकर हत्या की गई। 18 वर्षीय हमलावर ने स्वीकार किया कि उसने अहमदिया होने के कारण हत्या की।
  5. 2010, लाहौर: मई 2010 में 2 अहमदिया मस्जिदों पर हमले में 94 लोग मारे गए और 120 घायल हुए। इस हमले की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने ली थी।
  6. 1974, रबवाह: मई 1974 में जमात-ए-इस्लामी के छात्रों ने दंगे किए, जिसमें 27 अहमदिया मारे गए और उनके घरों, मस्जिदों, और दुकानों को बर्बाद कर दिया गया।
  7. 1953, लाहौर: 1953 में लाहौर में अहमदिया विरोधी दंगों में 200 से 200 अहमदिया मारे गए। यह हिंसा कट्टरपंथियों द्वारा अहमदियों को 'काफिर' घोषित करने की मांग से शुरू हुई और बड़े पैमाने पर मारकाट में बदल गई।

इसके अलावा, अहमदिया मस्जिदों और कब्रिस्तानों पर हमले आम हैं। 2022 में फैसलाबाद में 185 अहमदिया कब्रों के साथ बेअदबी की गई। 2023 में कराची में एक अहमदिया मस्जिद पर 2 बार हमला हुआ।

जान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे अहमदिया

पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय धार्मिक, कानूनी, और सामाजिक भेदभाव का शिकार है। 1974 के संवैधानिक संशोधन और 1984 के अध्यादेश XX ने उन्हें गैर-मुस्लिम घोषित कर उनके अधिकार छीन लिए। कट्टरपंथी मुसलमानों और ईशनिंदा कानून के दुरुपयोग ने हिंसा को बढ़ावा दिया। लाखों की आबादी वाला यह समुदाय अपनी जान और पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। अहमदिया समुदाय के लोग बार-बार पाकिस्तान की सरकार से सुरक्षा की मांग करते हैं, लेकिन उनकी मांगें अनसुनी कर दी जाती हैं और हिंसा का सिलसिला चलता रहता है।