Explainer: ट्रंप की पाक, ईरान, वेनेजुएला और ग्रीनलैंड पॉलिसी से किसे लगा झटका, भारत-चीन-EU बना रहे नया वर्ल्ड ऑर्डर?
अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर किए गए हालिया आक्रमण और अब ग्रीनलैंड पर ट्रंप के कब्जे की जिद ने पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचा दी है। अब यूरोप और नाटो देश भारत व चीन के साथ नये वर्ल्ड ऑर्डर की ओर बढ़ रहे हैं।

Explainer: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को अपने दूसरे कार्यकाल का एक साल पूरा कर लिया है। इस दौरान पाकिस्तान, ईरान, वेनेजुएला और ग्रीनलैंड पर ट्रंप की नीतियां वैश्विक व्यवस्था को हिला रही हैं। ट्रंप ने 20 जनवरी 2025 को दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद कई देशों पर सैन्य कार्रवाई करके, टैरिफ लगाकर और क्षेत्रीय माध्यमों से दबाव बढ़ाया। उनकी इन्हीं नीतियों की वजह से अमेरिका के सहयोगी देशों समेत यूरोप से लेकर नाटो तक को झटका लगा।
लिहाजा अब भारत-चीन और यूरोपीय संघ (EU) जैसे शक्तियां नया वर्ल्ड ऑर्डर तैयार करने की ओर बढ़ रही हैं। ट्रंप की आक्रामक नीतियों के चलते अब अमेरिका इंटरनेशनल लिबरल ऑर्डर के खिलाफ खड़ा दिखाई दे रहा है। ऐसे में अधिकांश देशों का भरोसा अब ट्रंप और अमेरिका से टूट चुका है। अब वह भारत और चीन जैसे देशों को नये विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। आइये एक्सपर्ट से समझते हैं कि अब किस तरह वैश्विक व्यवस्था बदलाव की ओर आगे बढ़ रही है?
ट्रंप की पाकिस्तान पॉलिसी और भारत से शिथिलता
ट्रंप के पहले कार्यकाल में जहां अमेरिका की पॉलिसी पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रही थी, वहीं उनके दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद एक तरह से पाक पर मेहरबान सी दिखती है। अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप ने पाकिस्तान को रणनीतिक साझेदार बनाया और बलूचिस्तान के 6 ट्रिलियन डॉलर के खनिज भंडारों पर समझौते किए। इसके साथ ही पाकिस्तान पर सिर्फ 19% टैरिफ लगाकर काफी छूट दी, जबकि भारत पर 50 फीसदी टैक्स लगाया। इससे भारत-अमेरिका के रिश्ते सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। ट्रंप की पाक से नजदीकी और भारत के साथ रिश्तों में आई शिथिलता के कई भू-राजनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं।
पाक अमेरिका के लिए सिर्फ टूल
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के असिस्टेंट प्रोफेसर और विदेशी मामलों के जानकार डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि पाकिस्तान अमेरिका के लिए लोकतांत्रिक और आर्थिक रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वह रणनीतिक रूप से उसके लिए जरूरी है, क्योंकि ट्रंप ईरान और अफगानिस्तान में अपने देश की धमक कायम रखना चाहते हैं। अफगानिस्तान से अमेरिका वापस हो चुका है। ऐसे में उसे ईरान में हस्तक्षेप के लिए और अफगानिस्तान पर दोबारा धमक बढ़ाने के लिए पाकिस्तान की मदद चाहिए। क्योंकि इस क्षेत्र में पाकिस्तान ही अकेला ऐसा देश है, जो अफगानिस्तान और ईरान में अमेरिका के राजनीतिक, रणनीतिक और कूटनीतिक हितों को साधने में मदद कर सकता है।
अमेरिका के लिए अब भी भारत है पाकिस्तान से ज्यादा महत्वपूर्ण
प्रो. अभिषेक कहते हैं कि अमेरिका के लिए भारत अब भी पाकिस्तान से ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत लोकतांत्रिक देश होने के नाते विश्व की चौथी आर्थिक महाशक्ति भी है। हाल ही में अमेरिका ने जिन 75 देशों को वीजा देने से मना किया है, उसमें पाकिस्तान भी शामिल है। जबकि अमेरिका ने भारत को चीन के खिलाफ गठित होने वाली पैक्स सिलिका में भी शामिल करने पर जोर दिया है। पैक्स सिलिका अमेरिकी नेतृत्व वाली एक ऐसी रणनीतिक पहल है, जिसका उद्देश्य एआई और सेमीकंडक्टर(सिलिकॉन) चिप के लिए दुनिया में सबसे सुरक्षित और मजबूत सप्लाई चेन बनाना है।
ताकि चीन के तकनीकि प्रभुत्व को खत्म किया जा सके। इसके अलावा ट्रंप ने पीएम मोदी को गाजा पीस प्लान बोर्ड में भी रखा है। हालांकि उन्होंने पाकिस्तान को गाजा पीस बोर्ड में मुस्लिम देश होने और उससे सेना की मदद के लिए रणनीतिक रूप से रखा है, जिसे स्वीकार या अस्वीकार करना पाक के लिए गले की हड्डी है। इससे साबित होता है कि भारत अभी भी अमेरिका लिए महत्वपूर्ण पिलर है।
ट्रंप से नजदीकी मुनीर को पड़ेगी भारी
प्रो. अभिषेक ने कहा कि पाकिस्तान से ट्रंप की नजदीकी नहीं है, बल्कि असीम मुनीर अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। वह हाल ही में 3 बार अमेरिका जा चुके हैं। पाक आर्मी चीफ मुनीर ने जो ट्रंप के साथ संबंध बढ़ाये हैं, वह पाकिस्तान के लिए आने वाले समय में गले हड्डी बनेगी, क्योंकि अमेरिका पाकिस्तान को टूल की तरह इस्तेमाल करना चाहता है और आगे भी करेगा। ऐसे में कई मामलों में मुनीर के लिए ट्रंप के आदेशों पर हां या ना कहना दोनों ही गले की हड्डी साबित होगा।
भारत-अमेरिका के रिश्तों में क्यों आई तल्खी?
भारत-अमेरिका के बीच रिश्तों में तल्खी आने के सवाल पर प्रो. अभिषेक ने कहा कि इसकी प्रमुख वजह रूस-यूक्रेन युद्ध रोकवाने में ट्रंप का असफल होना है। उन्होंने कहा कि ट्रंप के सलाहकारों ने उनको यह बात समझा दी कि रूस से भारत के तेल के खरीदने की वजह से ही यह युद्ध खत्म नहीं हो पा रहा है। इसके बाद ट्रंप अपनी असफलता का ठीकरा भारत पर फोड़ना चाह रहे। इसके बाद उन्होंने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया। इसकी वजह ये भी थी कि ट्रंप ने कहा था कि वह दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद 48 घंटे में रूस-यूक्रेन युद्ध रोकवा देंगे। मगर इसमें सफल नहीं हो पाए और अपनी असफलता छुपाने के लिए भारत पर आरोप मढ़ दिए।
दूसरा प्रमुख कारण भारत-पाक युद्ध रोकवाने का ट्रंप जबरन क्रेडिट ले रहे थे, लेकिन भारत ने किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को खारिज कर दिया। भारत किसी भी तरह अमेरिका के दबाव में नहीं आ रहा। इसलिए ट्रंप परेशान हैं और भारत के साथ अमेरिका की तल्खियां बढ़ गई हैं।
वेनेजुएला और ग्रीनलैंड मामले पर फंसा अमेरिका
राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला पर सैन्य आक्रमण करके और उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंदी बनाकर संयुक्त राष्ट्र से लेकर नाटा, यूरोप और रूस चीन के भी निशाने पर आ गया है। अमेरिका का एक धड़ा खुद ट्रंप के इस फैसला का विरोधी है। इसके बाद अब ग्रीनलैंड(ग्रेटलैंड) पर अमेरिकी कब्जे की नीयत जाहिर करके भी ट्रंप ने यूरोपीय और नाटो देशों समेत अपने कई सहयोगियों से रिश्ते खराब कर लिए हैं। ट्रंप ने सहयोगी देशों के साथ अमेरिका के रिश्तों में उस वक्त और भी कड़वाहट घोल दी, जब उन्होंने ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण का विरोध करने वाले फ्रांस, ब्रिटेन, डेनमार्क समेत 8 देशों पर 10 फीसदी टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया। यूरोपीय देशों पर अमेरिका की इस टैरिफ धमकी ने ट्रंप की उस रणनीतिक को एक्सपोज भी कर दिया, जो भारत समेत अन्य देशों पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत वह लगाते रहे हैं।
भारत-चीन-ईयू बना रहे नया वर्ल्ड ऑर्डर
अमेरिका ने जिस तरह से विभिन्न देशों पर हैवी टैरिफ लगाकर और ईरान पर हमला करके और अब ईरान व ग्रीनलैंड पर बार-बार हमले की धमकी देकर व हाल में वेनेजुएला पर सैन्य आक्रमण किया है, उससे नाटो और यूरोप का भरोसा अमेरिका से उठ गया है। लिहाजा अब यूरोप और नाटो देश भारत व चीन जैसे देशों की ओर देख रहे हैं। इस बीच अब भारत और यूरोप बड़ी ट्रेड डील करने जा रहे हैं। भारत और यूरोपीय संघ जैसे बड़े लोकतांत्रिक क्षेत्रों का साथ आना अमेरिका लिए बड़ा झटका है। अब दिख रहा कि विश्व को लोकतांत्रिक देश की जरूरत है, जिसमें अमेरिका इंटरनेशनल लिबरल ऑर्डर के खिलाफ खड़ा है।
जबकि लोकतांत्रिक भारत यूरोप, नाटो समेत ग्लोबल साउथ और एशिया तक में भरोसे का सबसे बड़ा प्रतीक बना है। क्योंकि ट्रंप ग्लोबलाइजेशन यानि फ्री ट्रेड के खिलाफ खड़े हो गए हैं। लिहाजा ट्रंप का टैरिफ दांव 2026 में उल्टा पड़ेगा। इसका असर ट्रंप को अमेरिका के मिड-टर्म इलेक्शन भी देखने को मिल सकता है। ऐसी परिस्थितियों में कनाडा, फ्रांस से लेकर रूस और चीन भी वेनेजुएला और ग्रीनलैंड के मुद्दे पर घेर रहे हैं। चीन और कनाडा व फ्रांस जैसे देश भारत और यूरोप के साथ नये वर्ल्ड ऑर्डर तैयार करने के पक्ष में हैं।