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सिंगूर और नंदीग्राम की हिंसा की कहानी, जिसने पश्चिम बंगाल की 34 साल पुरानी लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका!

West Bengal Political History: सिंगूर में ‘नैनो’ फैक्ट्री के विरोध और नंदीग्राम की हिंसा ने ऐसे आंदोलन को खड़ा किया, जिसने 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार की नींव को हिला दिया। पढ़िए राजनीति की ये दिलचस्प कहानी।

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Image Source : PTI (फाइल फोटो) ममता बनर्जी के सत्ता तक पहुंचने की कहानी।

Singur Nandigram Violence: पश्चिम बंगाल के सियासी इतिहास में 2007 का साल एक ऐसा पन्ना है, जिसे नंदीग्राम की हिंसा और सिंगूर की 'नैनो' कार फैक्ट्री से जुड़े विवाद के बिना समझना मुश्किल है। यह कहानी महज कृषि भूमि के अधिग्रहण की नहीं, बल्कि 34 साल से पश्चिम बंगाल में अजेय माने जाने वाले लेफ्ट के शासन के अंत की पटकथा थी। जानिए सिंगूर और नंदीग्राम में खड़े हुए आंदोलन ने कैसे 2011 के चुनाव में पश्चिम बंगाल की सरकार बदल दी थी।

सिंगूर-नंदीग्राम में कैसे पड़ी विरोध की नींव?

दरअसल, 2006 में तत्कालीन सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल में औद्योगिकीकरण की एक नीति शुरू की। इसी कड़ी में उन्होंने टाटा मोटर्स को लखटकिया 'नैनो' कार की फैक्ट्री खोलने के लिए हुगली जिले के सिंगूर में और पूर्वी मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम में एक केमिकल हब के लिए जमीन अधिग्रहण का निर्णय लिया था। लेफ्ट सरकार का तर्क था कि इससे राज्य में डेवलपमेंट और रोजगार आएगा, लेकिन किसानों ने बहुफसली जमीन छिनने के डर से इसे सीधा अपनी आजीविका पर हमला मान लिया था। 

जब सिंगूर में उठी खिलाफत की चिंगारी

फिर जब नैनो फैक्ट्री के लिए सिंगूर में जमीन ली जाने लगी, तो विरोध में जो चिंगारी उठी, वह नंदीग्राम आते-आते दावानल में बदल गई। इसके बाद, नंदीग्राम के किसानों ने अपनी जमीन को बचाने के लिए 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी' बनाई और इलाके में प्रशासन की एंट्री को बंद कर दिया।

14 मार्च 2007 का वह काला दिन

इसके बाद, नंदीग्राम में हालात तब बेकाबू हो गए जब पुलिस ने 14 मार्च 2007 को प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों और किसानों पर गोलियां चला दीं। इस बर्बर एक्शन में 14 लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। नंदीग्राम में हुए इस रक्तपात ने पश्चिम बंगाल की पूरी सियासत को झकझोर दिया।

बंगाल में सियासी बदलाव की आंधी

फिर इस जन-आक्रोश को TMC की नेता ममता बनर्जी ने राजनीतिक दिशा दी। उन्होंने नंदीग्राम से 'मां, माटी और मानुष' का नारा दे दिया और खुद किसानों की बड़ी आवाज बनकर उभरीं। बाद में लगातार बढ़ते विरोध की वजह से टाटा को अपना नैनो प्रोजेक्ट बंगाल से समेटकर राज्य के बाहर जाना पड़ा।

सिंगूर और नंदीग्राम के इन आंदोलनों ने पश्चिम बंगाल की सियासत की दिशा को हमेशा के लिए पलट दिया। किसानों के इस आक्रोश ने ऐसा तूफान लाया कि विधानसभा चुनाव 2011 में पश्चिम बंगाल में लेफ्ट सरकार भरभरा कर गिर गई और ममता बनर्जी पहली बार सीएम बन गईं। एक कार फैक्ट्री को लेकर शुरू हुआ विवाद, 34 साल पुरानी सत्ता के परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह बन गया।

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