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Hindi News Explainers Explainer: यूं ही नहीं बदला यूरोप, जानिए भारत भी क्यों यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंधों को कर रहा और मजबूत?

Explainer: यूं ही नहीं बदला यूरोप, जानिए भारत भी क्यों यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंधों को कर रहा और मजबूत?

भारत और यूरोपीय देशों के संबंध नए स्तर पर जा रहे हैं। वैश्विक राजनीति में मची हलचल ने इन संबंधों को बेहद जरूरी बना दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों का भी इसमें बड़ा योगदान है। ये संबंध साझा हितों, मूल्यों और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की साझेदारी का है।

India Relations With European Countries- India TV Hindi Image Source : @NARENDRAMODI/ (X)/ AP India Relations With European Countries

India Relations With European Countries: हाल के दिनों में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में बेहद तेज बदलाव देखने को मिले हैं। खासकर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से। ट्रंप की टैरिफ नीति ने दुनिया के तमाम देशों को झटका दिया है जिसका प्रभाव यूरोपीय देशों पर देखने को मिल रहा है। इसके अलावा कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन का आक्रामक आर्थिक-सैन्य रुख, ऊर्जा संकट और आपूर्ति शृंखला में आई बाधाओं ने भी यूरोपीय देशों को अपनी विदेश नीति और रणनीतिक साझेदारियों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया है। इसी समय में भारत यूरोप के लिए एक भरोसेमंद, स्थिर और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में उभरा है। ऐसे सवाल यह है कि वह किस तरह का डर है जो यूरोप को भारत की ओर धकेल रहा है और भारत क्यों यूरोपीय देशों के साथ अपने संबंध लगातार मजबूत कर रहा है। चलिए इस सवालों के जवाब भी जानते हैं।

ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति ने यूरोपीय देशों को सीधा झटका दिया है। अमेरिकी नीतियां ऐसी दिख रही हैं जैसे वो यूरोप को आर्थिक तौर पर बंधक बना रही हैं। NATO के जरिए सुरक्षा देने वाला अमेरिका आज मनमानी पर उतारू दिख रहा है। ट्रंप की टैरिफ धमकियां, व्यापारिक दबाव और ग्रीनलैंड पर कब्जे जैसे बयान यूरोप के लिए सीधी चेतावनी बन चुके हैं। ऐसे में यूरोपीय देश समझ चुके हैं कि अमेरिका के भरोसे रहना अब रणनीतिक तौर पर खुदकुशी की तरह है। ट्रंप प्रशासन की नीतियों ने यूरोप को मजबूर किया है कि वह भरोसेमंद साझेदार की तलाश करे और यहीं भारत की भूमिका अब बड़ी नजर आ रही है।

उजागर हो गई यूरोप की कमजोरी

रूस-यूक्रेन जंग ने यूरोप की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर कर दी है जो ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भरता है। वर्षों तक यूरोप सस्ती रूसी गैस और तेल पर निर्भर रहा है। जंग और प्रतिबंधों के बाद यूरोपीय देशों में गैस की कीमतें बढ़ी हैं। उद्योग प्रभावित हुए हैं और आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ा है। यूरोप को ऐसे साझेदार तलाशने की होंगे जो ऊर्जा, तकनीक और निवेश के नए विकल्प दे सकें। ऐसे समय में भारत ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और बड़े बाजार के रूप में उभरा है और यूरोप के लिए ऊर्जा सहयोग का अहम केंद्र बन रहा है।

चीन पर निर्भरता से असहज है यूरोप

चीन पर अत्यधिक आर्थिक निर्भरता भी यूरोप के लिए बड़ा डर है। इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयों के कच्चे माल, दुर्लभ खनिजों और मैन्युफैक्चरिंग में चीन की पकड़ ने यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को असहज किया है। चीन की आक्रामक कूटनीति, ताइवान मुद्दा और दक्षिण चीन सागर में तनाव ने यूरोप को यह सोचने पर मजबूर किया कि भविष्य में किसी एक देश पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। भारत ऐसे में चीन का विकल्प नहीं बल्कि चीन के साथ संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। भारत लोकतांत्रिक, नियम-आधारित व्यवस्था में विश्वास रखने वाला बड़ा देश है ये इसकी सबसे बड़ी ताकत भी बनी है।

Image Source : @narendramodi/ (X)PM Narendra Modi (L) European Council President Antonio Costa (R)

सप्लाई चेन में भारत है भरोसेमंद पार्टनर

कोविड-19 के बाद बिगड़े हालात और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने देशों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया है। दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और सेमीकंडक्टर जैसी आवश्यक वस्तुओं की कमी ने यूरोप को परेशान किया है। ऐसे में कहीं ना कहीं वैश्विक आपूर्ति शृंखला में विविधता लाने की जरूरत महसूस हुई है और भारत की मजबूत फार्मा इंडस्ट्री, बढ़ता मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और मेक इन इंडिया जैसी पहलें यूरोप के लिए भरोसेमंद विकल्प बन रही हैं। यही कारण है कि यूरोपीय कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा रही हैं। भारत ने कई देशों को मुफ्त कोविड वैक्सीन दी है ये तो पूरी दुनिया ने आंखों से देखा है। 

व्यवस्था पर भरोसे की है बात

यूरोप अपने लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकार और कानून के शासन पर जोर देता है। भारत एक ऐसा देश है जो लोकतंत्र, बहुलता और संवैधानिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। यूरोप को डर है कि यदि उसने ऐसे देशों पर भरोसा किया जो नियमों का सम्मान नहीं करते, तो भविष्य में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत इस मामले में अपेक्षाकृत विश्वसनीय साझेदार माना जाता है।

निवेश और तकनीक की है जरूरत

अभी तक आपने यह जाना कि क्यों यूरोप भारत की ओर देख रहा है। लेकिन, यह तो सभी जानते हैं कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। चलिए ऐसे में यह भी समझते हैं कि भारत क्यों यूरोप के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे रहा है। भारत को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रीन एनर्जी, डिजिटल टेक्नोलॉजी और रक्षा क्षेत्र के लिए उन्नत तकनीक और निवेश चाहिए। यूरोप इन क्षेत्रों में अग्रणी है। जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड और स्कैंडिनेवियाई देशों की कंपनियां भारत में स्मार्ट सिटी, रेलवे, इलेक्ट्रिक व्हीकल और क्लीन एनर्जी में निवेश कर रही हैं।

Image Source : @narendramodi/ (X)PM Narendra Modi (L) European Commission President Ursula von der Leyen (R)

वैश्विक मंच पर समर्थन

संयुक्त राष्ट्र, G20, WTO और जलवायु वार्ताओं जैसे मंचों पर भारत को यूरोपीय समर्थन की जरूरत है। यूरोप भी भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखता है जो ग्लोबल साउथ की आवाज को आगे बढ़ा सकता है। यह साझेदारी दोनों के लिए लाभकारी है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर बातचीत तेज हुई है। इससे दोनों पक्षों के बीच व्यापार बढ़ेगा, रोजगार के अवसर पैदा होंगे और आर्थिक संबंध मजबूत होंगे।

रक्षा और सुरक्षा के जरूरी

यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप ने अपनी रक्षा नीतियों पर पुनर्विचार किया है। भारत के साथ रक्षा उत्पादन, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा में सहयोग यूरोप के लिए रणनीतिक रूप से अहम हो गया है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका यूरोप के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। इतना ही नहीं जलवायु परिवर्तन यूरोप और भारत दोनों के लिए बड़ा खतरा है। कार्बन उत्सर्जन घटाने, नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ाने और हरित तकनीक विकसित करने में सहयोग दोनों को करीब ला रहा है। भारत का सोलर मिशन और यूरोप की ग्रीन टेक्नोलॉजी मिलकर एक मजबूत हरित साझेदारी बना सकती है।

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