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Hindi News Explainers Explainer: ग्रीनलैंड पर कब्जा क्यों करना चाहते हैं ट्रंप? तेल या खनिज नहीं, यहां जानिए मुख्य वजह

Explainer: ग्रीनलैंड पर कब्जा क्यों करना चाहते हैं ट्रंप? तेल या खनिज नहीं, यहां जानिए मुख्य वजह

ग्रीनलैंड में प्रचुर खनिज और तेल होने के बावजूद अमेरिका का असली लक्ष्य आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक लगता है। ट्रंप आर्कटिक में रूस-चीन के प्रभाव को रोकने और सैन्य-भूराजनैतिक बढ़त हासिल करने के लिए ही ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में चाहते हैं।

Greenland US interest, Trump Greenland plan, Arctic geopolitics- India TV Hindi Image Source : AP अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप।

लंदन: अमेरिका एक बार फिर ग्रीनलैंड पर अपनी नजरें गड़ा रहा है और इसी के साथ इसके प्राकृतिक संसाधन चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। एक साल पहले अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल वाल्ट्ज ने ग्रीनलैंड को लेकर कहा था कि 'यह महत्वपूर्ण खनिजों और प्राकृतिक संसाधनों की बात है।' लेकिन सवाल यह है कि ग्रीनलैंड के ये संसाधन इतनी बड़ी मात्रा में होने के बावजूद क्या मुनाफे का सौदा हो पाएंगे? क्या सच में ट्रंप खनिज या तेल की वजह से ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहते हैं, या निशाने पर कुछ और है? आइए, आसान भाषा में समझते हैं।

ग्रीनलैंड में प्रचुर मात्रा में हैं कई जरूरी खनिज

ग्रीनलैंड में जीवाश्म ईंधन और रेयर अर्थ मैटेरियल, दोनों ही काफी ज्यादा मात्रा में हैं। EU के द्वारा महत्वपूर्ण माने गए 34 कच्चे मालों में से कम से कम 25 ग्रीनलैंड में मौजूद हैं। ईयू का 2024 का क्रिटिकल रॉ मैटेरियल्स एक्ट इनकी आपूर्ति को मजबूत करने का लक्ष्य रखता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और EU दोनों ही इन संसाधनों पर चीन की पकड़ को कमजोर करना चाहते हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर तेल के बड़े भंडार हैं। लेकिन इन संसाधनों की कीमत का अनुमान लगाना मुश्किल है, क्योंकि तेल और इन कच्चे मालों के दाम बहुत ऊपर-नीचे होते रहते हैं।

Image Source : APग्रीनलैंड की राजधानी नुऊक के अलावा कहीं भी ढंग की सड़कें नहीं हैं।

ग्रीनलैंड में खनिज निकालना मुश्किल क्यों?

वेनेजुएला के तेल की तरह, ग्रीनलैंड में भी इन संसाधनों को निकालने के लिए बहुत सारा पैसा लगेगा। यहां सड़कें, बंदरगाह और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में भारी खर्च आएगा। खनन और जीवाश्म ईंधन के प्रोजेक्ट में शुरुआत में बहुत बड़ा निवेश चाहिए, और मुनाफा आने में सालों लग जाते हैं। ग्रीनलैंड में राजधानी नुऊक के अलावा पूरे द्वीप पर शायद ही कहीं सड़क है। बड़े जहाजों और टैंकरों के लिए गहरे पानी वाले बंदरगाह भी बहुत कम हैं। दुनिया भर में निजी कंपनियां सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सड़कों, बंदरगाहों, बिजली और मजदूरों का इस्तेमाल करके मुनाफा कमाती हैं। लेकिन ग्रीनलैंड से खनिज या तेल निकालने के लिए बहुत बड़ा निवेश चाहिए।

अमेरिकी कंपनियों को भी खनन का मौका मिला

ग्रीनलैंड में मौजूद खनिजों के बारे में दुनिया को लंबे समय से पता है। डेनमार्क ने यहां की एक क्रायोलाइट खदान से अच्छा-खासा मुनाफा कमाया था। हालांकि इसके अलावा कई विदेशी कंपनियों ने इस द्वीप पर खनन शुरू करने की कोशिश की है, लेकिन अब तक इस दिशा में कुछ खास नहीं हुआ है। ट्रंप के दावों के उलट कई अमेरिकी कंपनियों को भी यहां खनन का मौका मिला, लेकिन निवेश की लागत और मौसम का मिजाज देखते हुए किसी की भी माइनिंग शुरू करने की हिम्मत नहीं हो पाई।

Image Source : APग्रीनलैंड में खनन के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना बहुत मुश्किल है।

कब्जे के बावजूद अमेरिका को मुनाफा मुश्किल

ग्रीनलैंड में खनन से डेनमार्क में भी असर पड़ेगा, क्योंकि दोनों के बीच खनन से होने वाले मुनाफे के बंटवारे को लेकर समझौता हुआ है। डेनमार्क से स्वायत्तता के क्रमिक हस्तांतरण के तहत, अब ग्रीनलैंड अपने प्राकृतिक संसाधनों का मालिक है। 2021 में, पर्यावरण कारणों से ग्रीनलैंड सरकार ने जीवाश्म ईंधन की खोज और निकालने पर रोक लगा दी। संसद में बहुमत अब भी इस रोक के पक्ष में है। इस तरह देखा जाए तो तेल और गैस के दामों में उतार-चढ़ाव, कठोर मौसम और सुविधाओं की कमी से ग्रीनलैंड में जीवाश्म ईंधन निकालना अव्यावहारिक है, भले अमेरिका इस पर पूरी तरह कब्जा कर ले।

खनिज नहीं, रूस और चीन हैं ट्रंप के निशाने पर

दरअसल, अमेरिका को भी पता है कि ग्रीनलैंड से खनिजों का दोहन इतना आसान नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर नजर कई अन्य वजहों से है। इनमें से एक वजह तो यही है कि अमेरिका पूरे आर्कटिक क्षेत्र पर हावी होकर रूस और चीन के असर को कम करना चाहता है। अमेरिका के पास पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डे हैं, और डेनमार्क के साथ उसका अच्छा-खासा रक्षा समझौता है। इसलिए, अमेरिका के हालिया कदम उसकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं का एक और अध्याय लगते हैं। अमेरिका आने वाले दशकों में सामने आने वाली चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करना चाहता है, और यही वजह है कि वह एक के बाद एक ऐसे कदम उठाता जा रहा है।