Explainer: हॉर्मुज रूट से निकलना जहाजों के लिए आसान क्यों नहीं? जानें, क्या है ईरान की सेना का रोल
हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही मुश्किल हो गई है। IRGC की कड़ी निगरानी की वजह से यहां नाकेबंदी जैसे हालात पैदा हो गए हैं। इससे वैश्विक तेल-गैस आपूर्ति और भारत समेत कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो रही है।

Iran US Israel Conflict: हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया में चिंता पैदा कर दी है। ईरान ने अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे हमलों के बीच इस अहम समुद्री रास्ते पर नाकेबंदी कर दी है। इस फैसले का असर वैश्विक बाजारों पर साफ दिखाई दे रहा है, क्योंकि यह रास्ता तेल और गैस सप्लाई का सबसे बड़ा माध्यम है। दुनिया की करीब 20 से 25 प्रतिशत तेल और LNG सप्लाई (लगभग 20 से 21 मिलियन बैरल प्रतिदिन) इसी रास्ते से गुजरती है। हालांकि, ईरान ने कुछ चुनिंदा देशों के जहाजों को गुजरने की अनुमति दी है, और भारत भी उन देशों में शामिल है।
जंग के बीच जल्द समाधान निकलने की संभावना कम
ईरान अपने तट से 12 नॉटिकल मील तक के क्षेत्र को अपना क्षेत्रीय जल मानता है। उसने चेतावनी दी है कि दुश्मन देशों के जहाज अगर इस रास्ते से गुजरने की कोशिश करेंगे तो उन पर हमला किया जा सकता है। अमेरिका ने 15 सूत्रीय शांति योजना के जरिए युद्धविराम की कोशिश की है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि जल्द समाधान की संभावना कम है। इस वजह से जलडमरूमध्य के दोनों ओर जहाजों की लंबी कतारें लग गई हैं। दिलचस्प बात यह है कि तनाव के बावजूद अमेरिका और NATO देश सीधे हस्तक्षेप करने या रास्ता खोलने के लिए अपनी नेवी भेजने से बच रहे हैं।
आखिर क्यों अहम है हॉर्मुज जलडमरूमध्य?
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। इसके जरिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, इराक, बहरीन और ईरान जैसे देशों से तेल और गैस का निर्यात होता है। इस इलाके से जाने वाले तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदार भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया हैं, जो मिलकर लगभग 69 प्रतिशत सप्लाई का इस्तेमाल करते हैं। भारत की बात करें तो वह अपने करीब 40 प्रतिशत कच्चे तेल और 54 प्रतिशत एलएनजी इसी रास्ते से आयात करता है। इस कारण इस मार्ग में रुकावट से भारत समेत कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो रही है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की कड़ी निगरानी
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बहुत संकरा है और कई जगहों पर इसकी कुल चौड़ाई 30 किलोमीटर के आसपास ही है। यहां जहाज सीमित रास्तों से ही आ-जा सकते हैं और सबसे संकरी जगह पर जो लेन है वह 3 किलोमीटर से भी कम चौड़ी है। हर जहाज को ईरानी समुद्री सीमा के करीब से गुजरना पड़ता है, जिससे ईरान आसानी से उनकी निगरानी कर सकता है। इसी कारण कोई भी मालवाहक जहाज बिना ईरान की अनुमति के यहां से गुजरने का जोखिम नहीं उठाता।
जहाजों की आवाजाही में आई भारी गिरावट
28 फरवरी से शुरू हुए संघर्ष के बाद ईरान ने बिना अनुमति प्रवेश करने वाले करीब 20 जहाजों को निशाना बनाया है। इसकी वजह से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च में केवल 138 जहाज (जिनमें 87 तेल और गैस टैंकर शामिल हैं) ही इस रास्ते से गुजर पाए। यह रोजाना सिर्फ 5-6 जहाजों के बराबर है, जो पहले के मुकाबले लगभग 95 प्रतिशत कम है। तनाव से पहले रोजाना 135-140 जहाज इस रास्ते से गुजरते थे, जो दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा ले जाते थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, करीब 2000 जहाज अभी भी हॉर्मुज के आसपास सुरक्षित रास्ते का इंतजार कर रहे हैं।
जहाजों से ट्रांजिट शुल्क वसूल रहा ईरान
कुछ विदेशी रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान जहाजों से भारी ट्रांजिट शुल्क वसूल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षित रास्ता देने के लिए करीब 20 लाख डॉलर (लगभग 16-18 करोड़ रुपये) तक की मांग की जा रही है। हालांकि, ईरान ने इन दावों को खारिज कर दिया है। यह मार्ग अब पूरी तरह इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के नियंत्रण में है। जहाज को गुजरने से पहले कंपनी को IRGC से जुड़े माध्यमों के जरिए आवेदन करना होता है, जिसमें जहाज की पहचान, मालिकाना हक, माल की जानकारी, गंतव्य और चालक दल की जानकारी देनी होती है। इसके बाद इन दस्तावेजों की कड़ी जांच होती है और कच्चा तेल ले जाने वाले जहाजों को प्राथमिकता दी जाती है।
कैसे मिलती है जहाजों को गुजरने की इजाजत
ईरान से अनुमति मिलने पर जहाज को एक विशेष कोड और दिशा-निर्देश दिए जाते हैं। जब जहाज जलडमरूमध्य के पास पहुंचता है, तो VHF रेडियो के जरिए संपर्क कर उसकी पुष्टि की जाती है। इसके बाद गश्ती नौकाएं जहाज को सबसे संकरे हिस्से से सुरक्षित निकालती हैं और पूरी यात्रा IRGC की निगरानी में होती है। इस तरह देखा जाए तो हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को गंभीर संकट में डाल दिया है। स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो इसका असर तेल की कीमतों, आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक पड़ सकता है।