PHOTOS: बकरीद क्या है और यह बाक़ी ईद से कैसे अलग है? जानें कहानी

ईद-उल-अज़हा या ईद-उज़-ज़ोहा ये ईद इस्लामिक कैलेंडर के आख़िरी महीने ज़िलहिज्ज की दसवीं तारीख़ को मनाया जाता है। ये ईद मुसलमानों के पैग़म्बर और हज़रत मोहम्मद के पूर्वज हज़रत इब्राहिम की क़ुर्बानी को याद करने के लिए मनाई जाती है।
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ईद-उल-अज़हा या ईद-उज़-ज़ोहा ये ईद इस्लामिक कैलेंडर के आख़िरी महीने ज़िलहिज्ज की दसवीं तारीख़ को मनाया जाता है। ये ईद मुसलमानों के पैग़म्बर और हज़रत मोहम्मद के पूर्वज हज़रत इब्राहिम की क़ुर्बानी को याद करने के लिए मनाई जाती है।
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मुसलमानों का मानना है कि अल्लाह ने इब्राहिम की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ की क़ुर्बानी मांगी और इब्राहिम ने अपने जवान बेटे इस्माइल को अल्लाह की राह में क़ुर्बान करने का फ़ैसला कर लिया।
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इब्राहिम जब अपने बेटे को क़ुर्बान करने वाले थे अल्लाह ने उनकी जगह एक दुंबे को रख दिया। अल्लाह केवल उनकी परीक्षा ले रहे थे। दुनिया भर में मुसलमान इसी परंपरा को याद करते हुए ईद-उज़-ज़ोहा या ईद-उल-अज़हा मनाते हैं।
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इस दिन किसी जानवर (जानवर कैसा होगा इसकी भी ख़ास शर्ते हैं) की क़ुर्बानी दी जाती है और इसीलिए भारत में इसे बक़रीद भी कहा जाता है।
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इस ईद का संबंध हज से भी है जब दुनिया के लाखों मुसलमान हर साल पवित्र शहर मक्का जाते हैं।बकरे की क़ुर्बानी हज का एक अहम हिस्सा है।
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बकरीद हर साल हज यात्रा के खत्म होने पर मनाई जाती है, जो इस्लाम धर्म के पांच स्तंभों में से एक है। बकरीद हमें सिखाती है कि त्याग, ईमान और इंसानियत के रास्ते पर चलकर अल्लाह की राह में खुद को समर्पित करना ही असली भक्ति है।
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बकरीद पर नमाज अदा की जाती है, खास पकवान बनाए जाते हैं और कुर्बानी के जरिए समाज में जरूरतमंदों की मदद की जाती है।
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बकरीद हर इंसान को याद दिलाता है कि सच्चा धर्म वही है, जिसमें दूसरों की भलाई और परोपकार शामिल हो। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक सोच और जीवनशैली है जो इंसान को बेहतर बनाती है।
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बकरीद के दिन नमाज के बाद कुर्बानी की रस्म अदा की जाती है। इसके तहत बकरी, दुम्बा, भैंस या ऊंट की कुर्बानी की जाती है। इसका मकसद इब्राहीम की भक्ति और त्याग की याद को ताजा करना है।