कई बार बदला झंडा तब जाकर हमें मिला तिरंगा
क्या आप जानते हैं कि जिस तिरंगे को देश हमारा सीना शान से चौड़ा हो जाता है और हम फक्र से उसे सलामी देते हैं उसे इस रुप तक पहुंचने में कितना लंबा सफर करना पड़ा।

नई दिल्ली: आज 26 जनवरी है, हमारा गणतंत्र दिवस। आज ही के दिन हमारे देश में संविधान लागू हुआ था। आज ही के दिन हम गणतंत्र बने थे। हर साल आज ही के दिन हमारे राष्ट्रपति महोदय राजपथ पर तिरंगा फहराते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस तिरंगे को देश हमारा सीना शान से चौड़ा हो जाता है और हम फक्र से उसे सलामी देते हैं उसे इस रुप तक पहुंचने में कितना लंबा सफर करना पड़ा। जानिए तीन रंग के तिरंगे के सफर के बारे में....
इतिहास के पन्नों में हमारा झंडा:
पहला ध्वज:
साल 1906 में पहली बार भारत का एक आधिकारिक ध्वज फहराया गया था जिसे साल 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनि निवेदिता ने बनाया था। इसे बंगाल विभाजन के विरोध के दौरान कलकत्ता में कांग्रेस के अधिवेशन के दौरान भी फहराया गया था। इस पहले ध्वज में लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियां थीं। ऊपर की हरी पट्टी में 8 आधे खिले हुए कमल के फूल, नीचे की पट्टियों में सूरज और चांद बना था और बीच की पट्टी में वंदे मातरम लिखा गया था।
दूसरा ध्वज:
दूसरे झंडे को पेरिस में भीकाजी कामा और कुछ क्रांतिकारियों ने फहराया था। ध्वजारोहण के बाद सुबह इंडिया गेट पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था और लोगों की करतल ध्वनि के बीच यूनियन जैक को उतारकर भारतीय झंडे को फहराया गया था। यह भी कुछ कुछ पहले के झंडे जैसा ही था। हालांकि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर सिर्फ एक कमल था। इसमें सात तारे सप्तऋषि को दर्शाते थे।
तीसरा ध्वज:
साल 1917 में कुछ ऐसा दिखता था हमारा झंडा।
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