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Hindi News भारत राष्ट्रीय जज कैश कांड: जस्टिस वर्मा को हटाने के प्रस्ताव पर गठित हुई 3 सदस्यीय कमेटी, जानिए कौन-कौन शामिल हैं पैनल में?

जज कैश कांड: जस्टिस वर्मा को हटाने के प्रस्ताव पर गठित हुई 3 सदस्यीय कमेटी, जानिए कौन-कौन शामिल हैं पैनल में?

कैश कांड मामले में जस्टिस वर्मा को हटाने के प्रस्ताव पर लोकसभा ने 3 सदस्यीय समिति गठित की है। इस कमेटी में कौन-कौन लोग शामिल हैं? इनके नाम सामने आ गए हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा- India TV Hindi Image Source : REPORTER INPUT जस्टिस यशवंत वर्मा

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जस्टिस यशवंत वर्मा पर महाभियोग चलाने के प्रस्ताव पर तीन सदस्यीय समिति के गठन की घोषणा की है। तीन सदस्यीय कमेटी में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और एक कानूनविद को शामिल किया गया है। इस कमेटी में जस्टिस अरविंद कुमार,जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव और कानूनविद बी.वी. आचार्य का नाम शामिल है।

सांसदों ने की थी महाभियोग प्रस्ताव की मांग

पिछले महीने लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को ज्ञापन सौंपकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की मांग की थी। इसमें कांग्रेस, BJP, TDP, JDU और अन्य दलों के सांसद शामिल थे। इसके साथ ही जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और पीएम मोदी को पत्र लिखकर जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की सिफारिश की थी।

घर से बरामद हुई थी जली नकदी 

जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड एक हाई-प्रोफाइल मामला है। इसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा शामिल हैं। यह मामला 14 मार्च 2025 को दिल्ली में उनके सरकारी आवास पर लगी आग से शुरू हुआ, जब वहां से भारी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद हुई थी। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में कार्यरत थे।

इलाहाबाद कर दिया गया था ट्रांसफर

इस विवाद के बाद 28 मार्च 2025 को जस्टिस वर्मा को दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था। साथ ही उन्हें न्यायिक कार्यों से भी हटा दिया गया था। इसके बाद से वह विपक्षी नेताओं के निशाने में आ गए। ये मुद्दा लोकसभा में भी उठ गया। 

जानिए क्या होता है महाभियोग?

महाभियोग (Impeachment) भारत में एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसके तहत हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या अन्य उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों को उनके पद से हटाया जा सकता है। यह प्रक्रिया तब शुरू की जाती है, जब इन पदाधिकारियों पर किसी तरह के गंभीर आरोप लगते हैं।

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