हत्या से 10 दिन पहले ग्रेनेड अटैक, क्या पुलिस की लापरवाही ने ली थी महात्मा गांधी की जान? कोर्ट पहुंचा था मामला
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्या की प्लानिंग बहुत पहले से चल रही थी। इसकी रिहर्सल 20 जनवरी को की गई थी। बापू की हत्या से ठीक 10 दिन पहले एक व्यक्ति ने हैंड ग्रेनेड फेंका था, जो मंच से कुछ दूरी पर जाकर फटा था।

30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि इस ऐतिहासिक हत्या से ठीक 10 दिन पहले, 20 जनवरी 1948 को उसी जगह एक ग्रेनेड अटैक भी हुआ था। सवाल यह है कि अगर उस हमले को गंभीरता से लिया जाता, तो क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जान बचाई जा सकती थी?
मंच से कुछ दूरी पर जाकर फटा ग्रेनेड
20 जनवरी की शाम दिल्ली के बिड़ला भवन (अब गांधी स्मृति) में गांधीजी की प्रार्थना सभा चल रही थी। उसी दौरान भीड़ के बीच से एक व्यक्ति ने हैंड ग्रेनेड फेंका, जो मंच से कुछ दूरी पर जाकर फटा था। लोग इधर-उधर भागने लगे। गांधीजी उस ग्रेनेड अटैक से सुरक्षित बच गए, लेकिन यह कोई मामूली घटना नहीं थी।
तुरंत ही पकड़ा गया ग्रेनेड फेंकने वाला
ग्रेनेड फेंकने वाले की पहचान मदनलाल पाहवा के रूप में हुई, जिसे मौके पर ही पकड़ लिया गया। पूछताछ में साफ हो गया था कि यह हमला सुनियोजित साजिश का हिस्सा था और इसके पीछे कई लोग जुड़े हुए थे। ग्रेनेड हमले के बावजूद गांधीजी की सुरक्षा व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव नहीं किया गया।
नहीं बढ़ाई गई महात्मा गांधी की कोई सुरक्षा
इस हमले के बाद न तो महात्मा गांधी द्वारा रोजाना होने वाली प्रार्थना सभा की सार्वजनिक पहुंच रोकी गई, न ही साजिश के अन्य आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार किया गया और न ही गांधीजी की निजी सुरक्षा बढ़ाई गई। उस दौर के पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि हमले को एक अलग-थलग घटना मानकर जांच को सीमित रखा गया।
10 दिन बाद ही बापू की कर दी गई हत्या
10 दिन बाद यानी 30 जनवरी को वही जगह, वही प्रार्थना सभा और तब भी सुरक्षा में बड़ी चूक हुई थी। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने बिना किसी रोक-टोक के गांधीजी के बेहद करीब पहुंचा और गोलियां दाग दीं। यह वही स्थान था, वही समय और वही ढीली सुरक्षा व्यवस्था ने बापू की जान ले ली।
गांधी की सुरक्षा में थी गंभीर खामियां
गांधी की हत्या के बाद ये पूरा मामला कोर्ट में पहुंचा। इस पूरे ऐतिहासिक मुकदमे में यह तथ्य सामने आया कि 20 जनवरी का ग्रेनेड हमला हत्या की रिहर्सल थी, साजिशकर्ताओं को पूरा भरोसा हो गया था कि सुरक्षा में गंभीर खामियां हैं।
सशस्त्र गार्डों की संख्या नाकाफी थी
गांधीजी की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते रहे हैं। 20 जनवरी के हमले के बाद बिरला हाउस में सुरक्षा बढ़ाने की बजाय, गांधीजी खुद अतिरिक्त सुरक्षा से इनकार करते थे, क्योंकि वे अहिंसा के सिद्धांत पर चलते थे। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस की जिम्मेदारी थी कि वे खतरे को गंभीरता से लें। एक अमेरिकी सैनिक हर्बर्ट रेनर जूनियर, जो उस वक्त मौजूद थे। उन्होंने कोर्ट में गवाही दी कि हमले के बावजूद सशस्त्र गार्डों की संख्या नाकाफी थी।