अटल और अटूट: रजत शर्मा की बेबाक आवाज
रजत शर्मा ने केवल एक चैनल ही नहीं बनाया बल्कि इससे कहीं ज्यादा उन्होंने अपनेपन का रिश्ता बनाया। उनकी शुरुआत प्राइम-टाइम की चकाचौंध से कोसों दूर थी।
भारतीय मीडिया जगत में रजत शर्मा का सफर बिल्कुल वैसा ही है जैसा पिछले कुछ दशकों में हमारे देश के अंदर बदलावों की यात्रा रही है। उनका यह सफर देश के बदलावों के समानांतर रहा है। उनका करियर हमें एक ऐसा नजरिया देता है जहां से हम बीते 30 सालों के इतिहास को साफ देख सकते हैं। यह वो दौर था जिसने भारत में टेलीविज़न, राजनीति और सार्वजनिक डिबेट के टोन को बदल दिया।
काम पर टिके रहने की आदत
उनकी शुरुआत प्राइम-टाइम की चकाचौंध से कोसों दूर थी। दिल्ली की सब्जी मंडी में पले-बढ़े रजत शर्मा ने बचपन में रेलवे स्टेशन के लैंप की मद्धम रोशनी में पढ़ाई की। इस किस्से को अक्सर दोहराया जाता है, कभी-कभी इसे बहुत भावुक कहानी की तरह सुनाया जाता है। लेकिन अगर हम इसमें से भावुकता को हटाकर देखें, तो यह एक बहुत ही व्यावहारिक बात की ओर इशारा करता है: अनुशासन। काम पर टिके रहने की आदत। यह आदत ज़िंदगी भर उनके साथ रही।
अपनेपन का बनाया रिश्ता
इंडिया टीवी के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ के तौर पर, रजत शर्मा ने केवल एक चैनल ही नहीं बनाया बल्कि इससे कहीं ज्यादा उन्होंने अपनेपन का रिश्ता बनाया। उनके रात के शो 'आज की बात' में, उनकी टिप्पणी देश की जटिल और भारी-भरकम खबरों को कुछ इस तरह पेश करती है जिसे दर्शक दिन भर की थकान के बाद आसानी से समझ सकें। वहीं वर्ष 1993 में लॉन्च हुई 'आप की अदालत' के साथ उन्होंने एक ऐसा फॉर्मेट पेश किया जो बदलती सरकारों और दर्शकों की बदलती पसंद के बावजूद टिका रहा। इसकी सफलता का राज कोई शोर-शराबा या ड्रामा नहीं था बल्कि एक मजबूत स्ट्रक्चर था और वह गंभीर तनाव था जो उन सवालों का जवाब देते समय पैदा होता है, जो करोड़ों लोगों तक पहुंचने वाले होते हैं।
उनकी आवाज़ में यह दम टेलीविज़न से भी पहले का है। इमरजेंसी के दौरान उन्होंने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले आंदोलन का समर्थन किया और 11 महीने जेल में बिताए। कई युवा एक्टिविस्ट के लिए वह समय बहुत अहम था। रजत शर्मा के लिए उस समय ने एक बात बहुत पहले ही तय कर दी थी कि पत्रकारिता और सत्ता के बीच हमेशा टकराव रहता है। 1977 में जब उन्होंने श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स से ग्रेजुएशन किया और दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के जनरल सेक्रेटरी बने, तब तक उनके जीवन की दिशा और भी स्पष्ट हो चुकी थी।
2004 में रखी इंडिया टीवी की नींव
2004 में रितु धवन के साथ उन्होंने इंडिया टीवी की नींव रखी। यह न्यूज़ चैनलों की कमी वाला दौर नहीं था। फिर भी इस न्यूज चैनल ने अपने लिए जगह बनाई-जहां खबरों की अर्जेंसी को सहजता के साथ, तर्क को संवाद के साथ मिलाकर पेश किया जाए। यह शर्त छोटी नहीं थी। लेकिन यह काम कर गई।
2025 में न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट के तौर पर 2025-26 के टर्म के लिए उनका दोबारा चुना जाना उनके करियर के एक और पहलू को दिखाता है: इंस्टीट्यूशनल ज़िम्मेदारी। मीडिया में लीडरशिप अक्सर स्क्रीन पर सबसे ज़्यादा दिखती है। रजत शर्मा ने उस जगह को पाने में कामयाबी हासिल की है, साथ ही उसके पीछे की ज़िम्मेदारी को बनाने में भी मदद की है। 2015 में उन्हें मिले पद्म भूषण ने उस बात को औपचारिक रूप दिया जिसे दर्शक लंबे समय से पहचानते थे कि उनका असर रेटिंग्स से कहीं ज़्यादा था।
वह अक्सर अभावों की कहानी को दोहराते हैं लेकिन शिकायत के तौर पर नहीं, बल्कि ईंधन के तौर पर। उन्होंने कहा है कि गरीबी ने उनके सपने को कम नहीं किया। इसने उसे और तेज़ किया।
अपनी पहली बायलाइन के दशकों बाद भी रजत शर्मा भारतीय टेलीविजन पर एक जाना-माना चेहरा बने हुए हैं। उनकी सबसे खास बात केवल बदलाव के लिए बदलाव करना नहीं, बल्कि उनके दृष्टिकोण की निरंतरता है। उनकी आवाज़, शो का फॉर्मेट और सवाल पूछने का तरीका वर्षों बीतने और कई चुनाव आने-जाने के बावजूद आज भी पहले की तरह ही प्रभावशाली और भरोसेमंद बना हुआ है। उनकी कहानी सिर्फ़ उनकी निजी जीत की नहीं है, बल्कि भारतीय पत्रकारिता के बड़े इतिहास का एक चैप्टर भी है।
एक और साल पूरा होने पर, इंडिया टीवी परिवार रजत सर को उनके जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं देता है।
