World radio Day: कांग्रेस का 'अंडरग्राउंड रेडियो' जिसने भारत छोड़ो आंदोलन में ब्रिटिश सरकार की नाक में कर दिया था दम
World radio Day: संचार के साधनों में एक जमाने में रेडियो का काफी महत्व था। आजादी के आंदोलन में एक ऐसा वक्त आया जब रेडियो ने आंदोलनकारियों में जोश भरने का काम किया। जी हां, यह कांग्रेस रेडियो था जिसका प्रसारण गुप्त ठिकाने से किया जाता था।
World Radio Day: 13 फरवरी 1946 को अमेरिका में पहली बार रेडियो ट्रांसमिशन के जरिए संदेश भेजा गया था और संयुक्त राष्ट्र रेडियो की शुरुआत हुई थी। इसी की याद में हर साल 13 फरवरी को वर्ल्ड रेडियो डे मनाया जाता है। भारत की बात करें तो यहां जून 1923 में बॉम्बे रेडियो क्लब ने देश में पहली बार रेडियो का प्रसारण किया था। संचार के माध्यमों में एक समय रेडियो सूचना का एक बड़ा माध्यम माना जाता था। आपदा या इमरजेंसी के हालात में रेडियो का महत्व काफी बढ़ जाता है। वहीं मनोरंजन का भी यह यह सशक्त माध्यम रहा है। मोबाइल का दौर शुरू होने के बाद अब रेडियो का चलन कम हो गया है। एक दौर ऐसा भी था जब घरों में लोग रेडियो को पूरे चाव के साथ सुना करते थे। वहीं आजादी के आंदोलन के दौरान कांग्रेस रेडियो ने ब्रिटिश सरकार की नाक में दम कर दिया था। आइए जानते हैं इस घटना के बारे में..
करो- मरो के आह्वान के बाद बदला माहौल
दरअसल, 1942 में महात्मा गांधी के करो या मरो के आह्वान के बाद देश में बड़े पैमाने पर उथल-पुथल मची। ब्रिटिश राज ने आंदोलनकारियों की धर-पकड़ शुरू कर दी। हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। साथ ही अखबारों पर भी पाबंदियां लगा दी गई। आजादी के दीवानों की आवाज दबाई जा रही थी। ठीक ऐसे समय में कुछ क्रांतिकारियों के प्रयास से कांग्रेस रेडियो का गठन किया गया। यह स्वतंत्रता संघर्ष की आवाज बना। देशवासियों को आजादी के आंदोलन से जुड़ी हर जानकारी मिलने लगी।
9 अगस्त की शाम कांग्रेस समर्थकों की बैठक
दरअसल, 9 अगस्त 1942 की शाम को मुंबई में कुछ युवा कांग्रेस समर्थकों की बैठक हुई। इस बैठक में उनका मानना था कि नया अखबार निकालना इसका विकल्प नहीं हो सकता। आमराय यह नी कि कांग्रेस के अधिकतर नेता भाषणों के जरिए लोगों से सीधा संवाद करते हैं इसलिए उनकी आवाज आमलोगों तक पहुंचाना बेहतर विकल्प होगा। फिर मुख्य रूप से चार लोगों ने इसका बीड़ा उठाया-बाबूभाई खाखड़, विट्ठलदास झवेरी, ऊषा मेहता और नरीमन अबराबाद प्रिंटर।
ऊषा मेहता ने प्रसारण की जिम्मेदारी संभाली
फिर इस योजना को धरातल पर उतारने का काम शुरू हो गया। चौपाटी में सी व्यू बिल्डिंग में किराए के घर पर तेरह अगस्त की रात को प्रायोगिक तौर पर इस रेडियो को चलाया गया। 14 अगस्त को इस रेडियो पर प्रसारक की आवाज गूंजी-" यह कांग्रेस रेडियो है। 42.34 मीटर बैंड्स पर आप हमें भारत में किसी स्थान से सुन रहे हैं"। ऊषा मेहता ने प्रसारण की जिम्मेदारी संभाली और गिरफ्तारी तक इसे निभाया। इस रेडियो के प्रसारण ने देशवासियों में एक नया जोश भर दिया। आजादी के दीवाने ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने पर उतारू हो गए।
प्रसारण से अंग्रेजों के हाथ-पांव फूल गए
इस बीच ब्रिटिश सत्ता के कानों तक इस रेडियो की आवाज गूंजने लगी। पुलिस इस रेडियो नेटवर्क को उखाड़ फेंकने के लिए तत्पर हो गई। इससे बचने के लिए अलग-अलग जगह ट्रांसमीटर को शिफ्ट भी करना पड़ा। करीब 80 दिनों तक कांग्रेस रेडियो का प्रसारण चला। आखिरकार पुलिस महालक्ष्मी के पैराडाइज बंगला पर 12 नवंबर 1942 को छापा मारकर कांग्रेस रेडियो के सारे लोगों को गिरफ्तार कर लिया। बाबूभाई खाखड़, चंद्रकांत झवेरी और ऊषा मेहता को जेल की सजा हुई। विट्ठलदास झवेरी बरी हो गए जबकि प्रमुख किरदार नरीमन प्रिंटर सरकारी गवाह बन गए।
80 दिनों के प्रसारण में रेडियो कांग्रेस ने देशवासियों में आजादी के प्रति एक नया जुनून पैदा कर दिया। घर घर से आजादी के दीवाने सड़कों पर निकल पड़े। ब्रिटिश सत्ता को यह समझ में आने लगा था कि जिस तरह से जनता घर से निकल पड़ी है, अब भारत पर शासन करना मुमकिन नहीं है। आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो गया।
