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सीएबी को लेकर पूर्वोत्तर के लोगों की चिंताएं दूर की जा रहीं: रिजिजू

नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) को लेकर पूर्वोत्तर में जारी विरोध प्रदर्शनों के बारे में केंदीय मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को यहां कहा कि देश के इतिहास में पहली बार एक महत्वपूर्ण विधेयक संसद में लाया गया है, जिसे लेकर पूर्वोत्तर के लोगों की कुछ चिंताएं हैं, जिसे दूर की जा रही हैं।

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नई दिल्ली: नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) को लेकर पूर्वोत्तर में जारी विरोध प्रदर्शनों के बारे में केंदीय मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को यहां कहा कि देश के इतिहास में पहली बार एक महत्वपूर्ण विधेयक संसद में लाया गया है, जिसे लेकर पूर्वोत्तर के लोगों की कुछ चिंताएं हैं, जिसे दूर की जा रही हैं। रिजिजू ने कहा कि गृहमंत्री ने इस इस विधेयक पर चर्चा किया है और पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों की आवाज सुनी गई है। यह देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण विधेयक है। लेकिन इसे लेकर पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों की कुछ चिंताएं हैं, जिन्हें दूर की जा रही हैं।

केंद्रीय युवा एवं खेल मंत्री रिजिजू ने कहा, "मैं निश्चित ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह जी को पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों की इच्छाओं को समझने के लिए और उन्हें विश्वास में लेने के लिए शुक्रिया अदा करना चाहूंगा। वहां प्रदर्शन हो रहे हैं, कुछ चिंताएं हैं, लेकिन इन चिंताओं का समाधान किया जा रहा है।"

मंत्री ने फिक्की के एक कार्यक्रम से इतर कहा, "असम समझौते के मुख्य मुद्दे को सुलझाया जा रहा है। क्लाज 6 को सुलझाया गया है, इसके अलावा छह जनजातीय लंबित ट्राइबल स्टेटस की मांग को सुलझाया जा रहा है। वहीं मेघालय और त्रिपुरा के पूरे स्वायत्त क्षेत्र को नागरिकता संशोधन विधेयक से बाहर रखा गया है। इसके अलावा सिक्किम को भी कहा गया है कि उसकी चिंताएं और संविधान में उसके प्रावधान को नहीं बदला जाएगा। इसलिए पूरे पूर्वोत्तर को पूरी सुरक्षा दी गई है।"

इस मुद्दे पर विपक्ष के विरोध पर उन्होंने कहा, "विपक्षी केवल राजनीति कर रहे हैं। मैं पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र की चिंताओं को सावधानी से सुलझाने के लिए एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को शुक्रिया अदा करना चाहता हूं।"

पूर्वोत्तर में हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर उन्होंने कहा, "प्रदर्शन हो रहे हैं, जैसा कि मैंने पहले कहा, चूंकि मुद्दे के बारे में ठीक से बताया नहीं गया है और कुछ लोग समझना नहीं चाहते हैं। लेकिन वास्तविक मुद्दा यह है कि 1985 के असम समझौते के बाद इस मुद्दे को क्यों नहीं देखा गया। असम समझौते को अब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में समाधान किया जा रहा है। हमें यह समझने की जरूरत है। हम नहीं चाहते कि पूर्वोत्तर क्षेत्र किसी मिसकैंपनिंग के चक्रव्यूह में फंसे।"

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