A
  1. Hindi News
  2. मध्य-प्रदेश
  3. 'विदेशी अदालत का आदेश मानने को बाध्य नहीं', हाईकोर्ट ने बच्ची को कनाडा भेजने से किया इनकार

'विदेशी अदालत का आदेश मानने को बाध्य नहीं', हाईकोर्ट ने बच्ची को कनाडा भेजने से किया इनकार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 10 साल की एक बच्ची को कनाडा भेजने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि विदेशी अदालत का आदेश अंतिम नहीं, बल्कि बच्चे का हित सर्वोपरि है। बच्ची ने मां के साथ रहने की इच्छा जताई, जिसे ध्यान में रखते हुए पिता की याचिका खारिज कर दी गई।

Madhya Pradesh High Court custody case, child custody India vs foreign court, habeas corpus child cu- India TV Hindi
Image Source : PTI मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि विदेशी अदालत का आदेश मानने को हम बाध्य नहीं है।

इंदौर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 10 साल की बच्ची को उसके कनाडा में रहने वाले पिता के पास भेजने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी विदेशी अदालत का आदेश अंतिम नहीं होता, बल्कि बच्चे की भलाई सबसे ज्यादा जरूरी है। इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और बिनोद कुमार द्विवेदी ने पिता की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका को खारिज कर दिया। पिता ने मांग की थी कि बच्ची को कनाडा भेजा जाए और सुपीरियर कोर्ट ऑफ जस्टिस, ओंटारियो के फैमिली कोर्ट के आदेश के तहत उसकी कस्टडी उन्हें सौंपी जाए।

'माता सीता ने लव-कुश का पालन पोषण आश्रम में किया था'

कोर्ट ने 20 अप्रैल को दिए अपने आदेश में कहा कि कस्टडी से जुड़े मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात बच्चे का हित और उसकी भलाई होती है, न कि माता-पिता के कानूनी अधिकार। कोर्ट ने कहा, 'विदेशी अदालत का आदेश एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है, लेकिन यह अंतिम नहीं है। कोर्ट की आपसी मर्यादा बच्चे के हित से ऊपर नहीं हो सकती। अगर विदेशी आदेश बच्चे के हित के खिलाफ है, तो भारतीय अदालत उसे मानने के लिए बाध्य नहीं है।' फैसले में कोर्ट ने वाल्मीकि रामायण का उदाहरण देते हुए कहा कि माता सीता से अलग होने के बाद लव-कुश का पालन-पोषण महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में उनकी मां ने ही किया था।

2014 में महाराष्ट्र में हुई थी बच्ची के माता-पिता की शादी

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि इससे यह बात सामने आती है कि बच्चों के लिए भावनात्मक सुरक्षा, नैतिक शिक्षा और मां का सान्निध्य बहुत महत्वपूर्ण होता है। साथ ही कोर्ट ने संस्कृत श्लोक 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' का भी जिक्र किया, जिसका अर्थ 'मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं' होता है। याचिका के मुताबिक, बच्ची के माता-पिता की शादी 2014 में महाराष्ट्र में हुई थी। बाद में वे अमेरिका चले गए, जहां 2016 में शिकागो में बच्ची का जन्म हुआ और उसे जन्म से अमेरिकी नागरिकता मिली। इसके बाद परिवार कनाडा के टोरंटो में रहने लगा।

बच्ची ने अपनी मां के प्रति भावनात्मक लगाव जाहिर किया

जनवरी 2022 में मां अपनी बेटी के साथ भारत आई और वापस नहीं लौटी। उसने बच्ची का दाखिला इंदौर के एक स्कूल में करा दिया। इसके बाद पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया और पिता ने बच्ची को कनाडा भेजने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान बच्ची को कोर्ट में पेश किया गया। जजों ने उससे अपने कक्ष में बात की, जहां उसने अपनी मां के प्रति भावनात्मक लगाव जाहिर किया। कोर्ट ने कहा कि उसने बच्ची की उम्र, उसकी परवरिश के इस महत्वपूर्ण दौर में मां की जरूरत, उसकी पढ़ाई और भावनात्मक स्थिरता जैसे सभी पहलुओं को ध्यान में रखा है।