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Holi Kyu Manate Hain: होलिका दहन के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन होली क्यों मनाई जाती है? जानिए रंगों के इस पर्व की क्या कहानी है

Holi Kyu Manate Hain, Holi Khelne Ki Shuruaat Kaise Hui, Holi Mythological Story of Radha Krishna: होली मनाने के पीछे कई कथाएं प्रचलित है। चलिए जानते हैं कि सबसे पहले होली किसने खेली थी और क्यों मनाया जाता है रंगों का ये पर्व।

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Image Source : PTI सबसे पहले होली किसने खेली थी और क्यों मनाया जाता है रंगों का ये पर्व

Holi Kyu Manate Hain, Holi Khelne Ki Shuruaat Kaise Hui, Holi Mythological Story of Radha Krishna: फाल्गुन का महीना बहुत ही खास माना जाता है। क्योंकि इस महीने की समाप्ति और चैत्र माह की शुरुआत के साथ ही होली का त्योहार मनाया जाता है। इसके एक दिन पहले यानी की फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन का पर्व हिरण्यकश्यप और विष्णु जी के परम भक्त प्रह्लाद से जुड़ा है। यह तो सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपको यह पता है कि इसके अगले दिन मनाया जाने वाला होली पर्व क्यों मनाते हैं। तो चलिए जानते हैं होली खेलने की शुरुआत कैसे हुई और रंगों के त्योहार से जुड़ी राधा रानी और श्री कृष्ण की क्या कहानी है। 

रंगों के पर्व और राधा-कृष्ण से जुड़ी कथा (Holi Khelne Ki Shuruaat Kaise Hui)

इस पौराणिक कथा के अनुसार, रंगों का त्योहार सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण ने मनाया था। कहा जाता है कि कान्हा सांवले रंग के थे, जबकि राधा रानी दूध जैसी गोरी और बहुत सुंदर थीं। ऐसे में अपने रंग को लेकर कान्हा अक्सर ही अपनी मैया यशोदा से शिकायत किया करते थे कि मां मैं इतना सांवला क्यों हूं और राधिका इतनी गोरी क्यों है। मैया यशोदा अपने पुत्र के बड़े ही भोलेपन से कही इस बात पर मन ही मन खूब हंसती। बार-बार बेटे की एक ही मासूमियत भरी शिकायत सुन एक दिन मां यशोदा ने कान्हा को इसका एक हल बताया। माता यशोदा ने कहा कि कन्हैया जो तेरा रंग है उसी रंग को राधा के चेहरे पर भी लगा दो, फिर देखना कैसे तुम दोनों का रंग एक जैसा हो जाएगा। फिर क्या था कृष्ण अपनी मित्र मंडली ग्वालों के साथ राधा को रंगने के लिए उनके पास पहुंच गए। कृष्ण ने अपने मित्रों के साथ मिलकर राधा और उनकी सखियों को जमकर रंग लगाया। मान्यता है कि इस दिन से ही रंगों वाली होली खेलने की शुरुआत हुई है। द्वापर युग से चली आ रही यह परंपरा प्रेम, भक्ति और प्राकृतिक रंगों का उत्सव है। 

भक्त प्रह्लाद की कथा 

होली को लेकर प्रह्लाद और होलिका की मान्यता सबसे ज्यादा प्रचलित है, लेकिन बता दें कि यह पर्व रंगों के त्योहार से एक दिन पहले मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार, असुर राजा हिरण्यकश्यपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु की भक्ति करता था। यह हिरण्यकश्यपु को बिल्कुल मंजूर नहीं था, क्योंकि हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से नफरत करता था। लाख कोशिशों और दंडित करने के बाद भी जब उसका बेटा प्रह्लाद नहीं माना थे उसने अपनी बहन होलिका के साथ प्रह्लाद को मारने का षडयंत्र रचा। होलिका को वरदान में ऐसा वस्त्र मिला था, जिसे पहन कर वह आग में बिना जले रह सकती थी। इस वस्त्र को पहनकर होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से यह वस्त्र प्रह्लाद से लिपट गया और होलिका आग में जल गई। इसके बाद से होली का का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाने लगा। 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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