Adi Shankaracharya Jayanti 2026: हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आदि शंकराचार्य जी की जयंती मनाई जाती है। जो इस बार 21 अप्रैल 2026 को मनाई जा रही है। आदि शंकराचार्य जी का जन्म 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी नामक स्थान पर हुआ था। उन्होंने मात्र 32 वर्ष की आयु में अपने प्राणों का त्याग कर दिया था। उनका जीवन भले ही छोटा था, लेकिन उन्होंने इतने कम समय में वो कर दिखाया जो एक साधारण इंसान कई जन्मों में भी नहीं कर पाता। कहते हैं उस दौर में जब हिंदू संस्कृति पतन की ओर थी तब उन्होंने पूरे भारत की यात्रा कर सनातन धर्म को फिर से जीवित किया। उन्होंने अद्वैत वेदान्त के सिद्धांत को पूरी दुनिया के सामने मजबूती से रखा, जिसका सरल अर्थ है आत्मा व ब्रह्म अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं।
भारत की पैदल यात्रा और चार मठों की स्थापना
आदि शंकराचार्य ने अपने 32 साल के छोटे से जीवन में पूरे बार की तीन बार पैदल यात्रा की। उन्होंने केरल से अपनी यात्रा शुरू की, फिर ओंकारेश्वर में शिक्षा ली, काशी में अपने ज्ञान का विस्तार किया और केदारनाथ में समाधि ली। अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की। उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में पुरी और पश्चिम में द्वारका।
मात्र 8 साल की उम्र में वेदों का ज्ञान
आदि शंकराचार्य की तेज बुद्धि के किस्से आज भी सभी को हैरान कर देते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने मात्र 2 साल की उम्र में ही पढ़ना शुरू कर दिया था और 8 साल की उम्र तक उन्हें चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त हो गया था। कहते हैं जब वे 7 वर्ष के हुए तो उन्होंने माता से संन्यास की अनुमति मांगी और फिर सत्य की खोज में निकल गए।
सनातन धर्म को किया मजबूत
कहा जाता है कि आठवीं शताब्दी में जब सनातन धर्म आंतरिक मतभेदों और बाहरी चुनौतियों के कारण बिखर रहा था। तब उन्होंने 'अद्वैत वेदान्त' का झंडा गाड़ा। उन्होंने दुनिया को बताया कि ब्रह्म सत्यम् जगन्मिथ्या यानी ईश्वर ही एकमात्र सत्य है और वह हर जीव के भीतर है। उन्होंने एकता को मजबूत करने के लिए पुजारी परंपरा का एक खास नियम बनाया। जिसके तहत बदरीनाथ धाम के मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के होंगे, जबकि दक्षिण भारत के मंदिरों में पूजा की जिम्मेदारी उत्तर भारत के पुजारियों को दी गई। इसी तरह पूर्वी भारत के मंदिरों में पश्चिम भारत के पुजारी और पश्चिम भारत के मंदिरों में पूर्वी भारत के पुजारियों को नियुक्त किया गया। ऐसा करने के पीछे आदि शंकराचार्य जी का उद्देश्य बहुत स्पष्ट था - ताकि भारत के चारों कोनों के लोग एक-दूसरे की परंपराओं और संस्कृति को समझ सकें।
अखाड़ों की स्थापना
आदि शंकराचार्य जी ने सनातन धर्म के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और मठ-मंदिरों की रक्षा के लिए अखाड़ों की भी स्थापना की। उन्होंने साधुओं को शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण बनाया ताकि वे धर्म की रक्षा के लिए हर तरीके से तैयार रहें।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
यह भी पढ़ें:
Numerology: अपना लकी नंबर कैसे जानें? बर्थ डेट में छिपा है सफलता का सीक्रेट कोड, जो चमका देगा आपकी तकदीर!