भगवान विष्णु को क्यों कहते हैं सत्यनारायण, किसने दिया ये नाम? पढ़ें रोचक कथा
भगवान विष्णु को सत्यनारायण भी कहा जाता है और हिंदू घरों में सत्यनारायण कथा का पाठ भी करवाया जाता है। ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि विष्णु भगवान को सत्यनारायण नाम किसने दिया था।

भगवान विष्णु को सत्यनारायण भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में मान्यता रखने वाले लाखों लोगों के घर में सत्यनारायण की कथा आज भी होती है। माना जाता है कि घर में सत्यनारायण की कथा करने से सुख-समृद्धि आपको प्राप्त होती है। सत्यनारायण का पाठ करवाने से विष्णु भगवान के साथ ही माता लक्ष्मी का आशीर्वाद भी आप पाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु को सत्यनारायण क्यों कहा जाता है और किसने भगवान विष्णु को सत्यनारायण नाम दिया था। अगर नहीं, तो आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देंगे।
ब्रह्मा जी का अहंकार
शिव महापुराण में वर्णित है कि ब्रह्मा जी के मन में एक बार यह भाव उत्पन्न हुआ कि सृष्टि की रचना उन्होंने की। यही बात उन्होंने भगवान विष्णु को भी बताई तब विष्णु भगवान ने कहा कि यह आपका भ्रम है सृष्टि की रचना करने वाले भगवान शिव हैं। इस पर ब्रह्मा जी ने बोला कि वो शिव जो कैलाश पर बैठे रहते हैं जिनके नेत्र बंद रहते हैं? इस पर विष्णु भगवान बोले कि नहीं भगवान शिव तो कण-कण में व्याप्त हैं, जल में थल में हर जगह। तब भगवान ब्रह्मा बोले कि अगर शिव जी हर जगह हैं तो सामने खड़े इस पर्वत को हिलाओ यहां से भी शिव निकलेंगे। जब विष्णु और ब्रह्मा जी ने पर्वत को हिलाया तो उससे एक ज्योतिर्लिंग की आकृति निकली। विष्णु भगवान ने उस लिंग की स्तुति करना प्रारंभ किया, तब उस ज्योतिर्लिंग से आवाज निकली कि सृष्टि की रचनाकर्ता मैं हूं। तब ब्रह्मा जी बोले कि मैं मानने के लिए तैयार हूं, लेकिन मुझे इनका शीश देखना है। तब ब्रह्मा जी बोले कि मैं मानने के लिए तैयार हूं, लेकिन मुझे इनका शीश देखना है। ज्योतिर्लिंग से निकलने वाली आवाज ने कहा कि इस ज्योति रूपी स्तंभ के छोर का जो पता लगाएगा वही श्रेष्ठ होगा। तब वराह रूप धारण करके विष्णु जी स्तंभ के नीचे की ओर गए और ब्रह्मा जी हंस रूप में ऊपर की ओर। हालांकि भगवान विष्णु जानते थे कि शिव अनादि अनंत हैं और इनके छोर का मिलना असंभव है, इसलिए वो कुछ दूरी तय करके ही वापस लौट आए।
हालांकि, ब्रह्मा जी अपनी जिद्द पर अड़े रहे और उन्होंने शीश वाले छोर की तलाश करना जारी रखा। शीश की खोज में एक स्थान पर उन्हें गाय दिखी तो उन्होंने गाय से कहा कि तू मेरे लिए गवाही देना कि मैंने शिव जी का शीश देख लिया है। गाय ने मना किया कि मैं ऐसा नहीं करूंगी तो ब्रह्मा जी ने गाय को प्रलोभन दिया कि अगर तू मेरी बात मानेगी तो हर घर में तेरी पूजा होगी, यह सुनकर गाय गवाही देने के लिए मान गई। जब ब्रह्मा जी लौटने लगे तो गाय ने कहा कि हो सकता है कि कोई मेरी बात न माने इसलिए इस केतकी के फूल को भी गवाह बनाकर साथ ले चलो। केतकी का फूल भी यह गवाही देने के लिए मान गया कि ब्रह्मा जी ने शिव जी का मुख देख लिया है। इसके बाद जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी शिवलिंग के पास पहुंचे तो दोनों ने एक दूसरे से सवाल किया। विष्णु जी बोले कि क्या आपको शिव जी का शीश दिखा? इस पर ब्रह्मा जी ने विष्णु जी से बोला कि पहले आप बताइए आपको चरण दिखे? भगवान विष्णु ने शालीनता से उत्तर दिया कि नहीं मुझे शिवजी के चरण नहीं दिखे। भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली थी। वहीं ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल और गाय का सहारा लेकर झूठ बोलने की नाकाम कोशिश की।
शिवजी ने विष्णु भगवान को दिया सत्यनारायण नाम
ब्रह्मा जी का झूठ सुनकर शिवजी क्रोधित हो गए और गाय और केतकी पर भी उन्हें गुस्सा आया। तब शिव जी ने गाय को श्राप दिया कि तेरा पूरा शरीर पूज्य माना जाएगा लेकिन तेरा मुख अपूज्य होगा, वहीं केतकी के फूल को भगवान शिव ने श्राप दिया कि तुझे कभी मुझ पर नहीं चढ़ाया जाएगा। भगवान ब्रह्मा के झूठ से क्रोधित होकर शिव जी ने अपने नाखून से काल भैरव को अवतरित किया और उसे ब्रह्मा जी का शीश काटने का आदेश दिया। काल भैरव ने ब्रह्मा जी का झूठ बोलने वाला शीश काट दिया। जहां ब्रह्मा जी का शीश लुड़क रहा था वहीं से कर्मनाश नदी का उद्गम हुआ। विष्णु जी ने शिव जी से कहा कि इस शीश का क्या होगा लोग कहेंगे कि इसने झूठ बोला, इसपर शिव जी ने कहा कि इस शीश को मैं वटवृक्ष बना देता हूं और इस वृक्ष के नीचे बैठकर मैं तप करूंगा और मुझे बटकेश्वर नाम से जाना जाएगा। विष्णु जी ने सत्य का आचरण किया था और अपनी हार स्वीकार की थी इसलिए भगवान शिव ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु को सत्यनारायण नाम दिया था।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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