हिंदू धर्म में गुरु-शिष्य परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आदि शंकाराचार्य ने ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया था। धार्मिक मतानुसार, आदि शंकाराचार्य ने ही मठों की शुरुआत की और हिंदू धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम किया। आदि शंकराचार्य ने चार शिष्य बनाए और उन्हें देश के अलग-अलग कोनों में स्थित मठों की जिम्मेदारी सौंपी थी। इन मठों के प्रमुख को ही आज के समय में शंकराचार्य का दर्जा प्राप्त होता है।
कौन होते हैं शंकराचार्य?
अद्वैत वेदांत परंपरा में शंकाराचार्य की उपाधि सर्वोच्च मानी गई है। आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में हिंदू धर्म के संरक्षण हेतु देश के चार कोनों में चार मठ स्थापित किए थे। इन मठों के प्रमुख को ही आज हम शंकराचार्य की उपाधि देते हैं। शंकराचार्यों का मुख्य कार्य धर्म रक्षा करना और अपने ज्ञान से समाज में संतुलन बैठाना है।
कैसे होता है शंकराचार्य का चुनाव?
शंकराचार्य की परीक्षा को पास करने के लिए एक संन्यासी को कड़ी परीक्षा देनी पड़ती है। शंकराचार्य बनने के नियमों के बारे में आदि शंकराचार्य ने महानुशासन ग्रंथ में बताया है। शंकराचार्य बनने की पहली शर्त ये है कि व्यक्ति को संन्यासी होना चाहिए और उसे दर्शन, वेद, उपनिषदों और संस्कृत का प्रकांड विद्वान होना चाहिए। दूसरी शर्त ये है कि व्यक्ति ने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया हो। तीसरी शर्त पूर्व शंकराचार्य होने वाले शंकराचार्य का चुनाव करे। पीठासीन शंकराचार्य अपने सबसे योग्य शिष्य का चुनाव शंकराचार्य बनने के लिए करते हैं। उत्तराधिकारी के नाम पर काशी विद्वत परिषद और अन्य विद्वान शंकराचार्यों की भी सहमति होनी चाहिए।
भारत में कितने शंकराचार्य हैं?
भारत में 4 मुख्य पीठ हैं और इन मठों के मुखिया चार प्रमुख शंकराचार्य। यानि भारत में 4 शंकराचार्य हैं।
ज्योतिर्मठ- उत्तर भारत के उत्तराखंड राज्य में
गोवर्धन मठ- पूर्वी भारत के ओडिशा राज्य में
शृंगेरी शारदा पीठ- दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में
द्वारका शारदा पीठ- पश्चिम भारत के गुजरात राज्य में
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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