25 hour day on Earth | अगर कोई आपसे कहे कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब धरती पर एक दिन 24 नहीं बल्कि 25 घंटे का होगा तो क्या आपको यकीन होगा? हो सकता है कि आप कहें कि यह क्या बकवास है, लेकिन यह हकीकत है। धरती की अपनी धुरी पर चक्कर लगाने की स्पीड धीरे-धीरे कम हो रही है। सूर्य के इर्द-गिर्द घूमते हुए भी इसकी रफ्तार एक जैसी नहीं रहती। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि करोड़ों सालों में ये बदलाव दिन की लंबाई को प्रभावित करते हैं और भविष्य में बड़ा फर्क ला सकते हैं। यह प्रक्रिया पृथ्वी के जन्म से ही चल रही है लेकिन हम इसे नोटिस नहीं कर पाते क्योंकि यह बहुत धीमी है।
20 करोड़ साल बाद दिन में हुआ करेंगे 25 घंटे
हालांकि इसमें घबराने की कोई बात नहीं, क्योंकि 25 घंटे का दिन होने में करीब 20 करोड़ साल बाकी हैं। हमारी आने वाली हजारों पीढ़ियों को भी यह दिन देखना नसीब नहीं होगा। अब आप सोच रहे होंगे कि जो धरती निरंतर अपनी धुरी पर आराम से एक जैसी स्पीड में चक्कर काट रही है, वह धीमी क्यों होगी, तो इसका भी जवाब है। दरअसल, इसके पीछे मुख्य कारण चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण है। चंद्रमा पृथ्वी पर ज्वार पैदा करता है। ये ज्वार पानी को खींचते हैं, लेकिन पृथ्वी के घूमने की वजह से ये ज्वार थोड़ा पीछे रह जाते हैं। इस खिंचाव से एक घर्षण बनता है, जो पृथ्वी को धीमा करता है। बदले में चंद्रमा को थोड़ी ऊर्जा मिलती है, इसलिए वह हर साल पृथ्वी से 3.8 सेमी दूर होता जा रहा है।
डायनासोर के जमाने में होता था 23 घंटे का दिन
वैज्ञानिकों की गणना के मुताबिक हर 100 साल में दिन की लंबाई में लगभग 1.8 मिलीसेकंड की वृद्धि होती है। अगर यह दर बनी रही तो ठीक 20 करोड़ साल बाद दिन 25 घंटे का हो जाएगा। डायनासोर के जमाने में दिन 23 घंटे के आसपास थे, और अरबों साल पहले तो सिर्फ 19 घंटे के ही थे। यह प्रक्रिया पृथ्वी के विकास का हिस्सा है। इसलिए आज से वह वक्त 20 करोड़ साल दूर है जब धरती पर 25 घंटे का दिन होगा, इसलिए कम से कम हमें या हमारी आने वाली पीढ़ियों को इसकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन यह फैक्ट हमें जरूर बताता है कि हमारी जिंदगी के साथ-साथ हमारा ब्रह्मांड और ग्रहों की चाल लगातार बदलती रहती है।