Modi VS Didi: BJP का बढ़ता ग्राफ, Mamata की मजबूत पकड़; आखिर किसके नाम हो सकता है बंगाल? समझें पूरा समीकरण
दुष्यंत कुमार की लिखी मशहूर पंक्तियां 'सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए' आज भी पश्चिम बंगाल की राजनीति पर सटीक बैठती हैं। यहां सियासत सिर्फ कुर्सी की लड़ाई की नहीं, बल्कि सोच और संदेश की भी जंग है।
पश्चिम बंगाल की राजनीतिक कहानी हमेशा बदलावों से भरी रही है। एक समय था जब यहां Communist Party of India(Marxist) और Congress का दबदबा था। तब लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा ने राज्य की दिशा तय की लेकिन वक्त बदला और इसी बदलाव की लहर पर सवार होकर All India Trinamool Congress ने सत्ता हासिल की। ममता बनर्जी ने न सिर्फ सरकार बनाई बल्कि जनता के बीच अपनी अलग पहचान भी मजबूत की और पहचान भी एक ऐसी नेता के रूप में, जो सीधे लोगों से जुड़ती नजर आईं। लेकिन आप जानते ही होंगे कि लोकतंत्र में ठहराव ज्यादा समय तक नहीं रहता।
बंगाल में भाजपा की मजबूत होती पकड़
पिछले कुछ सालों में भाजपा ने बंगाल में अपनी पकड़ धीरे-धीरे मजबूत की है। हम अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह बदलाव साफ दिखाई देता है। साल 2014 से पहले बंगाल में जहां BJP का वोट शेयर सिर्फ 5–6% था, वहीं 2014 के लोकसभा चुनाव में यह बढ़कर 17% हो गया। इसके बाद साल 2019 में यह करीब 40% तक पहुंचा और पार्टी ने 18 सीटें जीत लीं। अगर बात 2021 के विधानसभा चुनाव की करें तो उसमें भी BJP ने लगभग 38% वोट और 77 सीटें हासिल कर यह संकेत दे दिया कि अब वह सिर्फ एक छोटी ताकत नहीं, बल्कि मुख्य चुनौती बन चुकी है।
भाजपा कैसे हुई इतनी मजबूत?
भाजपा के इस उभार के पीछे कई कारण हैं। बंगाल में Left और Congress के कमजोर होने से उनका पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे BJP की ओर खिसक गया। इसके अलावा पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की लगातार रैलियों और रणनीति ने भी पार्टी को ताकत दी। हालांकि बंगाल में उनका पूरा प्रभाव अभी दिखना बाकी है लेकिन इतना तय है कि मुकाबला अब टक्कर का हो चुका है।
2021 में कैसा रहा माहौल?
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में माहौल काफी तेज़ और टकराव भरा रहा। तब एक तरफ जहां अमित शाह की रैलियों में Citizenship Amendment Act (CAA) और NRC जैसे मुद्दे केंद्र में रहे जहां नागरिकता को पहचान से जोड़कर एक मजबूत नैरेटिव बनाया गया। वहीं दूसरी तरफ ममता बनर्जी ने अपने काम और योजनाओं पर भरोसा जताया। इसी दौरान सुवेंदु अधिकारी के साथ उनका सीधा मुकाबला भी काफी चर्चा में रहा जिसने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया था।
2026 के चुनाव में पार्टी ने बदली स्ट्रैटेजी
बंगाल में पहले चरण का चुनाव हो चुका है और आपको बता दें कि इस चुनाव में BJP की रणनीति में बदलाव भी देखने को मिला। भाजपा सिर्फ बड़े मुद्दों तक सीमित नहीं रही बल्कि स्थानीय समस्याओं जैसे महिला सुरक्षा, रोजगार, कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर भी जोर दिया। पार्टी ने बूथ स्तर तक तैयारी की, हर सीट का अलग हिसाब और जमीनी काम पर ध्यान बढ़ाया है। इस पूरी रणनीति में सुनील बंसल जैसे रणनीतिकार ने अहम भूमिका निभाया है हालांकि 'घुसपैठ' और 'तुष्टीकरण' जैसे मुद्दे अब भी पार्टी के प्रमुख हथियार बने हुए हैं।
ममता बनर्जी का जवाब
इस चुनाव में भाजपा के उलट ममता बनर्जी का जवाब भी उतना ही मजबूत है। उनका 'बंगाल बनाम बाहरी' का संदेश BJP को राज्य के बाहर की पार्टी के रूप में पेश करता है। वहीं BJP 'बंगाल का गौरव' और देश के साथ जुड़ाव की बात करती दिखी है। यह टकराव सिर्फ नेताओं का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग सोच का बन चुका है। ज़मीनी स्तर पर देखा जाए तो Trinamool Congress की सबसे बड़ी ताकत उसकी योजनाएं हैं। ममता सरकार की Lakshmir Bhandar, Kanyashree और Duare Sarkar जैसी योजनाओं ने सीधे लोगों तक पहुंच बनाकर भरोसा कायम किया है। आपको बता दें कि खासकर महिलाओं और अल्पसंख्यक वर्ग का समर्थन TMC के लिए अहम माना जाता है। वहीं BJP इन सबसे अलग, लगातार यह मुद्दा उठाती रही है कि केंद्र की योजनाएं राज्य में सही तरीके से लागू नहीं हुई। वहीं TMC इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताती रही है। इसके साथ ही राजनीतिक हिंसा का मुद्दा भी बार-बार चर्चा में आता दिखा लेकिन बंगाल में यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी अलग-अलग दौर में ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं।
चुनाव में सबसे बड़ा सवाल
आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या BJP का यह लगातार बढ़ता आधार सत्ता में बदल पाएगा या ममता बनर्जी की जमीनी पकड़ एक बार फिर भारी पड़ेगी? बता दें कि बंगाल की राजनीति सिर्फ नारों से तय नहीं होती, बल्कि लोगों के भरोसे, जुड़ाव और अनुभव से तय होती है। यही वजह है कि इस बार की लड़ाई सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि छवि और काम दोनों की परीक्षा है।
