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Hindi News पश्चिम बंगाल बंगाल में हर दिन डूबने से मरते हैं 25 से ज्यादा लोग, आधे से ज्यादा बच्चे, सामने आया ये पैटर्न

बंगाल में हर दिन डूबने से मरते हैं 25 से ज्यादा लोग, आधे से ज्यादा बच्चे, सामने आया ये पैटर्न

पश्चिम बंगाल में हर दिन 25 से ज्यादा लोग डूबने से मरते हैं, जिनमें आधे बच्चे होते हैं। एक सर्वे में सामने आया है कि 1–9 साल के बच्चे सबसे ज्यादा खतरे में हैं।

West Bengal drowning deaths, child drowning India- India TV Hindi Image Source : PTI बंगाल में एक साल में करीब 9000 लोगों की मौत डूबने से होती है।

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में हर दिन औसतन 25 से ज्यादा लोग डूबने की वजह से अपनी जान गंवाते हैं, जिनमें से आधे बच्चे हैं। यह खुलासा एक हालिया सर्वे में हुआ है। सर्वे के मुताबिक, हर साल सूबे में करीब 9000 लोग डूबने की वजह से मरते हैं। यह सर्वे पिछले साल राज्य की लगभग 1.8 करोड़ आबादी पर किया गया था। सर्वे में पाया गया कि 1 से 9 साल के बच्चे सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। इन बच्चों की मृत्यु दर 121 प्रति लाख है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा में से है।

'हर दिन 25 से ज्यादा लोग डूबने से मरते हैं'

यह सर्वे चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट (CINI) और द जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ ने मिलकर किया। इसकी रिपोर्ट कोलकाता में कल World Drowning Prevention Day पर जारी की गई। इस मौके पर पश्चिम बंगाल बाल अधिकार संरक्षण आयोग (WBCPCR) ने भी हिस्सा लिया। CINI के संस्थापक सचिव और मशहूर डॉक्टर समीर चौधरी ने बताया, 'वास्तव में हर दिन 25 से ज्यादा लोग डूबने से मरते हैं, क्योंकि कई बार ऐसी मौतों की खबर दर्ज नहीं होती।' उन्होंने कहा कि दुनियाभर में हर साल 3 लाख लोग डूबने से मरते हैं, जिनमें से 18 फीसदी मौतें भारत में होती हैं। भारत में होने वाली इन मौतों में से 17 फीसदी अकेले पश्चिम बंगाल में होती हैं।

'CPR न मिलने की वजह से बच नहीं पाते'

CINI की CEO इंद्राणी भट्टाचार्य ने बताया, '1 से 4 साल के बच्चे पास के तालाबों या पानी के गड्ढों में डूब जाते हैं, जब उनकी मांएं घर के कामों में व्यस्त होती हैं। वहीं, 4 से 10 साल के बड़े बच्चे खेलते, नहाते या तैरते वक्त डूब जाते हैं। कई बार वे CPR न मिलने की वजह से बच नहीं पाते।' सर्वे में यह भी सामने आया कि ज्यादातर हादसे दोपहर 12 से 2 बजे के बीच होते हैं, जब माता-पिता खेतों में काम करने या मजदूरी में व्यस्त होते हैं। इंद्राणी ने कहा, 'ऐसे हादसों का इल्ज़ाम अक्सर मां पर लगाया जाता है, जो गलत है।'

रोकथाम के लिए उठाए गए कई कदम

इंद्राणी ने बताया कि डूबने से रोकने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा, 'हमने 101 तालाबों के आसपास बाड़ लगाने का काम शुरू किया है। यह काम स्थानीय पंचायतों की मदद से हो रहा है, जो तालाब मालिकों को सुरक्षा के लिए राजी कर रहे हैं।' इसके अलावा, सुंदरबन इलाके में 'कवच केंद्र' बनाए गए हैं, जहां दोपहर के वक्त छोटे बच्चों की देखभाल की जाती है, जब उनके माता-पिता व्यस्त होते हैं। WBCPCR की अध्यक्ष तूलिका दास ने कहा, 'यह आंकड़ा चौंकाने वाला है। हमें डूबने की घटनाओं को कम करने के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे। बच्चों को तालाबों में गिरने से रोकना होगा और अगर कोई हादसा हो, तो CPR के जरिए उनकी जान बचानी होगी।'

हादसों में लापरवाही का है बड़ा हाथ

सर्वे में पाया गया कि 93 फीसदी मामलों में बच्चे डूबते वक्त अकेले थे, और कोई बड़ा मौजूद नहीं था। 90 फीसदी से ज्यादा मामलों में बचाव परिवार वालों या पड़ोसियों ने किया, जो CPR जैसे तरीकों से अनजान थे। सिर्फ 10 फीसदी पीड़ितों को CPR मिला, और केवल 12 फीसदी को पानी से निकालने के बाद अस्पताल ले जाया गया। केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2024 में 'नेशनल स्ट्रैटेजी फॉर प्रिवेंशन ऑफ अनइंटेंशनल इंजरी' शुरू की थी, जिसमें डूबने को 4 प्रमुख समस्याओं में शामिल किया गया है। सर्वे के जरिए सरकार और संगठनों से बच्चों को बचाने के उपायों पर काम करने की अपील की गई है। (PTI)