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जयप्रकाश नारायण की गाड़ी पर चढ़ने से... बंगाल के सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने तक; "ममता" से "दीदी" तक की कहानी

पश्चिम बंगाल की राजनीति की जब भी बात होती है तो एक नाम लगभग स्थायी रूप से सामने आता है, ममता बनर्जी का। सीएम ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी जनसंपर्क क्षमता और “दीदी” की छवि रही है।

बंगाल का नाम लेते ही कई छवियां उभरती हैं- हावड़ा ब्रिज, रसगुल्ले और सांस्कृतिक विरासत। लेकिन राजनीति की बात होते ही एक नाम लगभग स्थायी रूप से सामने आता है ममता बनर्जी। सड़कों पर संघर्ष करने वाली एक आक्रामक युवा नेता से लेकर पश्चिम बंगाल की सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर भारतीय राजनीति की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है। ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की। छात्र जीवन से ही सक्रिय रहीं ममता अपने तीखे विरोध और आक्रामक अंदाज के लिए जानी जाती थीं। जयप्रकाश नारायण की गाड़ी पर चढ़कर विरोध करना हो या सड़कों पर धरना देना उनका अंदाज उन्हें भीड़ से अलग करता था। यही पहचान उन्हें जल्द ही राष्ट्रीय राजनीति में ले आई, जब उन्होंने जादवपुर सीट से चुनाव लड़ा और सोमनाथ चटर्जी जैसे दिग्गज को हराकर संसद पहुंचीं।
 
समय के साथ कांग्रेस में मतभेद बढ़े और अंततः उन्होंने अपनी पार्टी All India Trinamool Congress (TMC) की स्थापना की। 2011 में उन्होंने इतिहास रचते हुए Communist Party of India (Marxist) के नेतृत्व वाले 34 साल पुराने वाम शासन को समाप्त कर दिया। यह जीत सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि बंगाल की राजनीतिक दिशा बदलने का दावा भी थी।

सत्ता के साथ विवाद भी जुड़े

हालांकि सत्ता के साथ विवाद भी जुड़े। शारदा और रोज वैली जैसे चिटफंड घोटालों ने सरकार की छवि को झटका दिया। Saradha chit fund scam में लाखों निवेशकों के पैसे डूबे और कई राजनीतिक नाम सामने आए। इसके अलावा Narada sting operation, शिक्षक भर्ती विवाद और कथित कोयला तस्करी जैसे मुद्दों ने सरकार को लगातार घेरा। इन मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई को ममता बनर्जी ने राजनीतिक प्रतिशोध बताया, जबकि Bharatiya Janata Party ने इसे भ्रष्टाचार का प्रमाण कहा।

सरकार पर “एंटी-इंकम्बेंसी” और प्रशासनिक थकान के आरोप

लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद अब उनकी सरकार पर “एंटी-इंकम्बेंसी” और प्रशासनिक थकान के आरोप लग रहे हैं। पार्टी के भीतर मतभेद भी खुलकर सामने आने लगे हैं, जो किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए चिंता का विषय होता है। इसके साथ ही कानून-व्यवस्था, खासकर महिला सुरक्षा के मुद्दे ने भी सरकार की छवि को प्रभावित किया है।

जनसंपर्क क्षमता और “दीदी” की छवि ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत

फिर भी ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी जनसंपर्क क्षमता और “दीदी” की छवि रही है। यही कारण है कि तमाम विवादों और चुनौतियों के बावजूद वे अब भी बंगाल की राजनीति का केंद्रीय चेहरा बनी हुई हैं। आज सवाल यह नहीं है कि ममता बनर्जी का प्रभाव है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उन्होंने वास्तव में बंगाल की राजनीतिक संस्कृति बदली है या सिर्फ सत्ता का चेहरा बदला है। क्या जनता बदलाव चाहती है, या “दीदी” पर भरोसा अब भी कायम है? बंगाल की राजनीति आने वाले समय में इन सवालों के जवाब जरूर देगी।