वॉशिंगटन: चीन को अभी आर्थिक संकट से निकलने में काफी समय लगेगा। ऐसे में अगर भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के देश मार्केट समर्थित सुधारों को लागू करें तो यह भारत की सदी बन सकती है। इस तरह के विचार अमेरिकी विशेषज्ञों के एक ग्रुप ने व्यक्त किया है।
इस हफ्ता वॉशिंगटन एग्जामिनर में प्रकाशित एक लेख में अमेरिकी थिंक टैंक अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टिट्यूट (AEI) के निकोलस एबरस्टैड, डेरिक सीजर्स, डैन ब्लूमेंथल और सदानंद धूमे ने लिखा है, 'लगता है चीन लंबे समय तक आर्थिक मंदी का शिकार रहेगा लेकिन भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के देश सफलतापूर्वक मार्केट समर्थित सुधारों को लागू करें तो यह 'भारतीय सदी' हो सकती है।
AEI के विशेषज्ञों ने लिखा, 'थोड़ा चीन की आर्थिक मंदी और इसका प्रतिकूल भौगोलिक भविष्य को इस बात का श्रेय जाता है कि भारत को बहुत ही तेजी से बदल रहे एशिया में खुद के लिए अधिक जगह बनाने का अवसर मिला है।' उनलोगों ने उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बहुत ही ज्यादा बिजनस मैत्री माहौल ने 1 अरब से ज्यादा आबादी वाले देश को लेकर नई उम्मीदें जगी हैं।
उन विशेषज्ञों ने यह भी उल्लेख किया है कि वॉशिंगटन को नई दिल्ली के साथ कई कारणों से मजबूत संबंध बनाना चाहिए। चारों विशेषज्ञों ने कहा कि दोनों देशों ने इस बात से इनकार किया है कि उनकी पार्टनरशिप चीन को ध्यान में रखकर हुई है लेकिन यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि दोनों देशों ने पेइचिंग के बढ़ते हुए दबदबे पर चिंता व्यक्त की है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके दबदबे को कम करने की इच्छा भी जताई है।
आगे उनलोगें ने लिखा, 'इस्लामी चरमपंथियों द्वारा उत्पन्न हिंसा के माहौल में भारत स्थिरता का नखलिस्तान है। अफगानिस्तान में हिंसा में बढ़ोतरी के साथ-साथ पाकिस्तान में आतंकवाद और अल्पसंख्यक शिया मुस्लिमों के जनसंहार से इस क्षेत्र में काफी अस्थिरता पैदा हो गई है लेकिन इस सबके बावजूद भारत में शांति और स्थिरता है जो इस क्षेत्र में भारत के महत्व को रेखांकित करता है। इसके अलावा भारत में लोकतांत्रिक और बहुलतावादी व्यवस्था के साथ-साथ अंग्रेजी बोलने वाले बड़ी संख्या में मध्य वर्ग का होना एशिया के अन्य छोटे देशों के लिए आदर्श का काम कर सकता है।
इसके अलावा अमेरिका और भारत के बीच बहुत सी समानताएं भी हैं। हालांकि भारत में इकॉनमी को नियंत्रित करने में सरकार बड़ी भूमिका निभाती है लेकिन यहां प्राइवेट सेक्टर को संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन की तरह बहुत ही स्वतंत्रता प्राप्त है जो चीन में नहीं है। लेख में उल्लेख किया गया है, 'सही परिस्थिति में अगर सही पॉलिसी अपनाए तो भारत आने वाले दशकों में पूर्वोत्तर के अपने प्रतिद्वंद्वी को पीछे छोड़ सकता है। संयुक्त राज्य इसका स्वागत करेगा।
लेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि अगर खास सुधारों से अमेरिकी कंपनियों को कोई तुरंत लाभ न भी मिले फिर भी भारत को अधिक प्रतियोगी और मार्केट ऑरियंटेड इकॉनमी बनने में अमेरिका को भारत के प्रोत्साहन के साथ-साथ सहायता भी करनी चाहिए। संयुक्त राज्य अमेरिका का भारत के टॉप ट्रेड पार्टनर बने रहने का लक्ष्य रखना चाहिए और किसी एक कंपनी को इस अजेंडा का हाइजैक करने नहीं देना चाहिए।
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