दिल्ली हाई कोर्ट ने किशोरों के प्रेम से जुड़े आपराधिक मामलों में एक अहम बात कही है। दिल्ली हाई कोर्ट ने इन मामलों में दंड की जगह विवेकपूर्ण निर्णय को प्राथमिकता देने के लिए एक नरम रुख अपनाने की वकालत की। न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि किशोरों के बीच प्रेम स्वाभाविक और मानवीय विकास का हिस्सा है और इसे दंडित करने की बजाय सम्मान और सहमति से बने रिश्तों को मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किशोरों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और बिना किसी अपराधीकरण के भय के संबंध बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए।
"प्रेम एक स्वाभाविक मानवीय अनुभूति है"
न्यायाधीश ने 30 जनवरी को पारित और 14 फरवरी को उपलब्ध कराए गए आदेश में कहा, "प्रेम एक स्वाभाविक मानवीय अनुभूति है और किशोरों को भावनात्मक संबंध बनाने का अधिकार होना चाहिए, बशर्ते वे सहमति से बने हों और उनमें कोई दबाव या शोषण न हो।" उन्होंने यह भी कहा कि कानून का ध्यान प्रेम को दंडित करने की बजाय, शोषण और दुर्व्यवहार को रोकने पर होना चाहिए। अदालत ने कहा, "सहमति की कानूनी उम्र नाबालिगों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, मुझे लगता है कि किशोरों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और अपराधीकरण के डर के बिना संबंधों में शामिल होने की अनुमति दी जानी चाहिए।’’
निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया
यह निर्णय एक मामले के संदर्भ में आया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन अपराध से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत आरोपी व्यक्ति को बरी करने वाले निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। यह मामला दिसंबर 2014 का था, जब एक लड़की के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी नाबालिग बेटी ट्यूशन से घर नहीं लौटी है। लड़की के पिता ने ट्यूशन पढ़ाने वाले व्यक्ति पर शक जताया, क्योंकि वह भी लापता था। पुलिस ने जांच की और लड़की को घर लाया, जबकि आरोपी के खिलाफ यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज किया गया था। लड़की की उम्र उस समय लगभग 16 वर्ष थी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने व्यक्ति को बरी करने का फैसला बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि निचली अदालत का निर्णय तर्कपूर्ण और उचित था और इसमें किसी भी प्रकार की हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी। (इनपुट- भाषा)
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